रक्षाबंधन पर जानिए कौन है असली रक्षक

Raksha Bandhan रक्षाबंधन पर जानिए कौन है असली रक्षक

नमस्कार दर्शकों! SA news के खबरों की खबर का सच स्पेशल कार्यक्रम में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। आज के कार्यक्रम में हम 11 अगस्त, गुरुवार को देशभर में मनाए गए त्योहार “रक्षाबंधन” के बारे में चर्चा करेंगे और साथ ही जानेंगे की क्या रक्षाबंधन मनाने से भाई की उम्र बढ़ती है और क्या भाई बहन की हर परिस्थिति में रक्षा कर सकता है?

हिन्दू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है रक्षाबंधन का त्योहार। यह प्रतिवर्ष श्रावण मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। इस दिन बहनें अपने भाई की आरती उतारती हैं ,माथे पर कुमकुम का तिलक, चावल और हल्दी लगाती हैं, कलाई पर राखी यानी कोई सजीला धागा या मौली बांधती हैं। बहन भाई के अच्छे स्वास्थ्य और लंबे जीवन की कामना करती है और भाई बहन को उसकी रक्षा करने का वचन देता है। भाई बहन एकदूसरे को मिठाई खिलाकर मुंह मीठा करते हैं। फिर भाई अपनी हैसियत अनुसार बहन को कुछ रूपये या कोई तोहफा भेंट में देता है। जब एक हिंदू परिवार में बेटा बेटी का जन्म होता है तो दोनों को आपस में बचपन से ही एकदूसरे से प्रेम करना ,मदद करना , सम्मान करना और बांट कर खाने की सीख मात पिता देते हैं और रक्षाबंधन का पर्व मनाना सिखा कर सदा एकदूसरे से प्रेम करने का पाठ पढ़ाते हैं।

आपको बता दें कि रक्षाबंधन का यह त्योहार पौराणिक कथाओं पर आधारित है इसका हमारे मूल सदग्रन्थों, गीता जी ,शास्त्रों से कहीं दूर दूर तक भी कोई संबध नहीं है।

कुछ विशेष पौराणिक कथाएं जिनके आधार पर मनाया जाता है आज भी रक्षाबंधन का पर्व?

भारतीय संस्कृति और हमारे जीवन में त्योहारों का बहुत महत्व है। सभी त्योहार किसी न किसी घटना से संबंधित हैं। रक्षाबंधन भी इसी से जुड़ा है। रक्षाबंधन की कहानी ऐसी है कि एक बार भगवान विष्णु ने वामन अवतार धारण कर बलि राजा के अभिमान को इसी दिन चकानाचूर किया था। इसलिए यह त्योहार ‘बलेव’ नाम से भी प्रसिद्ध है।

अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, सतयुग में जब राजा बलि ने यज्ञ संपन्न कर स्वर्ग पर अधिकार प्राप्त करने का प्रयत्‍‌न किया, तब देवराज इंद्र ने भगवान विष्णु से प्रार्थना की। विष्णु जी वामन ब्राह्मण बनकर राजा बलि से भिक्षा मांगने पहुंचे। अपने गुरु शुक्राचार्य के मना करने पर भी बलि ने तीन पग भूमि दान कर दी। वामन भगवान ने तीन पग में आकाश-पाताल और धरती नाप कर राजा बलि को रसातल में भेज दिया। राजा बलि ने अपनी भक्ति के बल पर विष्णु जी से हर समय अपने सामने रहने का वचन ले लिया। भगवान के वचन देने के बाद लक्ष्मी जी इससे चिंतित हो गई। नारद जी की सलाह पर लक्ष्मी जी बलि के पास गई और रक्षासूत्र बांधकर उसे अपना भाई बना लिया और रक्षासूत्र बांधने के बदले में वे विष्णु जी को अपने साथ ले आई। बताया जाता है की उस दिन श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि थी। वास्तव में वामन अवतार धारण कर विष्णु जी नहीं बल्कि पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी धरती पर आए थे और बली राजा को स्वर्ग तथा पाताल दोनों का राज्य दिया था।

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एक अन्य कथानुसार द्वापरयुग में श्री कृष्ण और द्रौपदी को भाई-बहन माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार शिशुपाल का वध करते समय भगवान कृष्ण की तर्जनी उंगली कट गयी थी। तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी फाड़कर उनकी उंगली पर पट्टी बांधी थी। उस दिन श्रावण पूर्णिमा का दिन था। तभी से रक्षाबंधन श्रावण पूर्णिमा को मनाया जाता है। ऐसी मान्यता है कि कृष्ण ने एक भाई का फर्ज निभाते हुए चीर हरण के समय द्रौपदी की रक्षा की थी। वास्तव में वे कृष्ण नहीं बल्कि पूर्ण परमात्मा थे जिन्होंने द्रौपदी का चीर बढ़ाकर उसकी इज्ज़त की रक्षा की थी, क्योंकि द्रौपदी ने अपने प्रारब्ध में किसी अंधे साधु को वस्त्र दान किया था जिसका फल उसे कौरवों की सभा में परमेश्वर को पुकारने पर लाज रक्षा के रूप में तुरन्त मिला।

एक और कथा के अनुसार इतिहास के राजा पोरस को सिकंदर की पत्नी ने राखी बांधकर अपने सुहाग की रक्षा का वचन मांगा था। जिसके चलते सिकंदर और पोरस ने रक्षासूत्र की अदला बदली की थी। एक बार युद्ध के दौरान सिकंदर ने पोरस पर हमला किया तो वह रक्षासूत्र देखकर उसे अपना दिया हुआ वचन याद आ गया और उसने पोरस से युद्ध नहीं किया। विवेक कहता है कि युद्ध कभी भी किसी के लिए अच्छे साबित नहीं हुए। लाखों सैनिक युद्ध में मारे जाते हैं क्या वे किसी के बेटे, भाई या पति नहीं हुए? अतः इस प्रकार की कहानियों का तर्क देकर रक्षाबंधन के त्योहार को शास्त्र सम्मत नहीं ठहराया जा सकता है।

कलयुग में जहां नैतिक और मानवीय मूल्यों का ह्रास हो चुका है आज लोग रक्षाबंधन केवल एक रीतिरिवाज के चलते इसे मनाने की परंपरा के रूप में आगे बढ़ा रहे हैं। इसे मनाने से कोई लाभ तो नहीं मिलने वाला बल्कि हानि ही हानि होगी क्योंकि यह परमात्मा कि विधान अनुसार बिल्कुल गलत परंपरा है।

भाईबहन श्रावण मास की पूर्णिमा को इसलिए मनाते है ताकि भाई , अपनी बहन की रक्षा कर सके। लेकिन लोग ये विचार नहीं करते की भाई बहन की रक्षा करेगा तो भाई की रक्षा कौन करेगा?

विचार कीजिए क्या कोई भाई 24 घंटे अपनी बहन की जान की रक्षा कर सकता है ? क्या वह उसका 365 दिन का पहरी बन सकता है ? जवाब है नहीं।

रक्षा कीजिए उन बहनों की जिन्हें या तो मार दिया जाता है ता मरने पर मजबूर कर दिया जाता है-

  • बचाना है तो देश और विश्व के सभी भाई- उन सभी बहनों को बचाऐं जो दहेज के नाम पर जान देने को विवश कर दी जाती हैं।
    बहन को बेटा पैदा करने के लिए मजबूर होने से बचाएं।
  • हिंदू लड़की का मुस्लिम लड़के से प्रेम होने पर उसकी हत्या होने से बचाएं।
  • जींस पहनने पर जान से मारने से बचाएं।
  • खुद की बहन से तो सभी धर्म के भाई प्रेम करते हैं दूसरे की बहन बेटी पर बदनियत रखने से खुद को और दूसरों को रोकें।
  • बहन के साथ ज़मीन जायदाद के बंटवारे पर विवाद होने से बचें। आपसी प्यार को प्राथमिकता दें।

वास्तविकता तो यही है की पूर्ण परमात्मा के अतिरिक्त कोई भी किसी की भी रक्षा करने में सक्षम नहीं है। अक्सर हम रक्षाबंधन के पर्व पर अखबार और टीवी चैनलों में सैकड़ों खबरें पढ़ते और सुनते हैं कि रक्षाबंधन के दिन ही भाई की जगह उसकी अर्थी घर पर पहुंची।

एक अन्य घटना में बहन से राखी बंधवाकर अपने घर को लौट रहे भाई की सड़क हादसे में मौत हो गई। इस वर्ष भी ऐसा ही एक मामला एमपी के मंदसौर से सामने आया है जिसमे राखी बांधने आई बहन के ऊपर छत गिरने से उसकी उसी समय दर्दनाक मौत हो गई। यदि राखी बांधने से बहन की रक्षा होती तो रक्षाबंधन के दिन बहनों की दर्दनाक मौतें न होती। यह तो केवल एक उदाहरण है टीवी और समाचारपत्र खोलकर देखिए इस दिन हुई भाई- बहन की मौत के कारण और संख्या जानकर आपके रौंगटे खड़े हो जाएंगे।

प्यारे मित्रों! रक्षाबंधन का त्योहार मनाने का जिक्र पवित्र चारों वेद और पवित्र श्रीमद भगवद गीता में कहीं पर भी नहीं मिलता। पवित्र वेदों और गीता जी में पूर्ण परमात्मा द्वारा दिया गया ज्ञान लिखा हुआ है। पवित्र गीता जी में किसी भी त्योहार को मानने का जिक्र नहीं मिलता। गीता जी के अध्याय 16 के श्लोक 23 और 24 के अनुसार कोई भी त्योहार मनाना शास्त्र विधि को त्यागकर मनमाना आचरण करना है। अर्थात यह परमात्मा के विधान विरुद्ध है। यहाँ यह बताना हम आवश्यक समझते है कि यह प्रतीकात्मक त्योहार केवल रूढ़िवादिता का एक स्वरूप है।

वास्तव में सबकी रक्षा तो केवल पूर्ण अविनाशी परमात्मा कविर्देव ही कर सकते हैं। परमात्मा कबीर जी वाणी द्वारा समझाते हैं;

पाप पुण्य की बांधी पोटरिया, कैसे होवे हल्की।।
मात-पिता परिवार भाई बन्धु, त्रीरिया मतलब की,
चलती बरियाँ कोई ना साथी, या माटी जंगल की।

ये संसार रैन का सपना, ओस बूंद जल की,
सतनाम बिना सबै साधना गारा दलदल की।।
अन्त समय जब चलै अकेला, आँसू नैन ढलकी,
कह कबीर गह शरण मेरी हो रक्षा जल थल की।।

परमात्मा कबीर जी ने बताया है कि हे भोले मानव (स्त्री/पुरूष)! परमात्मा का नाम जाप कर तथा शुभ कर्म कर। पता नहीं कल यानि भविष्य में क्या दुर्घटना हो जाएगी। एक पल का भी ज्ञान नहीं है।

माता-पिता, भाई-बहन, पतिपत्नी आदि-आदि परिजन अपने-अपने मतलब की बातें सोचते हैं। पूर्व जन्मों के कारण परिवार रूप में जुड़े हैं। जिस-जिसका समय पूरा हो जाएगा, संस्कार समाप्त होता जाएगा, वह तुरंत परिवार छोड़कर चला जाएगा। जैसे रेल में डिब्बा भरा होता है, जिस-जिसने जहाँ-जहाँ की टिकट ले रखी है, वहाँ-वहाँ उतरकर चले जाते हैं। यह परिवार रेल के डिब्बे की तरह है। मृत्यु के उपरांत यह शरीर मिट्टी हो जाता है। उस समय तेरा कोई परिवार का सदस्य साथी नहीं होगा।

इस संसार के सर्व प्राणी परमात्मा द्वारा रचित विधान को पूरा करने के निमित्त मात्र बनते हैं। इसलिए सभी लोगों को चाहिए की पूर्ण संत से नामदीक्षा लेकर परमेश्वर कबीर साहेब जी के नाम का रक्षासूत्र बंधवाए, जिससे आपके और आपके परिवार की जल, थल, गगन, हर एक जगह रक्षा हो सके क्योंकि वास्तव में सबके रक्षक और संकट मोचन “कबीर परमेश्वर” जी ही हैं।

हम भाई-बहनों को एक दूसरे की सुरक्षा की चिंता और एकदूसरे के साथ प्रेम भाव से अवश्य रहना चाहिए परंतु इसके लिए मनुष्य की मनुष्य को पूजा ,तिलक और त्योहार मनानेे की कतई आवश्यकता नहीं है । विश्व के सभी भाई-बहनों से प्रार्थना है कि कृपया पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी के वर्तमान अवतार तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के सत्संग विचार सुनिए और परमात्मा को पहचानिए, उनसे नाम उपदेश लेकर वेदों में वर्णित भक्तिविधि को अपनाएं और अपना जीवन कल्याण कराएं। आप संतरामपालजी को ट्विटर, फेसबुक, इंसटाग्राम पर भी फॉलो कर सकते हैं।

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