सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ जज जस्टिस संजय करोल 22 अगस्त 2026 को अपने पद से सेवानिवृत्त हो गए हैं। अपने लगभग चार दशक लंबे कानूनी सफर और 19 वर्षों के न्यायिक कार्यकाल के समापन पर आयोजित विदाई समारोह में उन्होंने कई दूरगामी और मानवीय बातें कहीं। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ में अपने आखिरी कार्यदिवस पर जस्टिस संजय करोल ने स्पष्ट कहा कि “हम जज कोई भगवान नहीं हैं, इसलिए यह उम्मीद नहीं की जानी चाहिए कि हमारा हर फैसला पूरी तरह सही होगा”।

विदाई भाषण के दौरान सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (SCBA) और सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि न्याय करने के लिए एक विशेष स्तर की विनम्रता जरूरी है। जजों को केवल याचिकाओं के तथ्यों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि कोर्टरूम में खड़े आम इंसान के दर्द और उसकी उम्मीदों को देखना चाहिए।

संजय करोल

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जस्टिस संजय करोल का 40 साल का कानूनी सफर और करियर टाइमलाइन

जस्टिस संजय करोल का जन्म 23 अगस्त 1961 को शिमला में हुआ था। उन्होंने अपनी वकालत की शुरुआत हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट से की थी। वे हिमाचल प्रदेश के महाधिवक्ता (Advocate General) भी रहे और बाद में त्रिपुरा तथा पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में अपनी सेवाएं दीं। 6 फरवरी 2023 को उन्हें सुप्रीम कोर्ट के जज के रूप में पदोन्नत किया गया था।

समय सीमा / तारीखपद / ऐतिहासिक पड़ावमुख्य विवरण
23 अगस्त 1961जन्मशिमला, हिमाचल प्रदेश
1986 – 2007वकील के रूप में अभ्यासहिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में 21 साल वकालत की
1998 – 2003एडवोकेट जनरलहिमाचल प्रदेश राज्य के शीर्ष कानून अधिकारी के रूप में सेवा दी
2007हाईकोर्ट जजहिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट के न्यायाधीश नियुक्त हुए
2018 – 2023चीफ जस्टिस (HC)त्रिपुरा हाईकोर्ट और बाद में पटना हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश बने
6 फरवरी 2023सुप्रीम कोर्ट जजभारत के सर्वोच्च न्यायालय में जज के रूप में पदोन्नति
22 अगस्त 2026सेवानिवृत्तिसुप्रीम कोर्ट से 3.5 साल से अधिक सेवा के बाद रिटायर हुए

‘न्याय के लिए विनम्रता जरूरी’: जस्टिस संजय करोल के भाषण के मुख्य बिंदु

अपने फेयरवेल एड्रेस में जस्टिस संजय करोल ने न्यायपालिका के काम करने के तरीके और संविधान की आत्मा पर प्रकाश डाला। उनके संबोधन के प्रमुख बिंदु इस प्रकार हैं:

  • जज भगवान नहीं होते: न्यायपालिका को अपनी सीमाओं को पहचानना चाहिए। याचिका से सिर्फ मामले के तथ्य पता चलते हैं, लेकिन यह नहीं पता चलता कि पीड़ित इंसान ने क्या खोया है।
  • धर्म का अर्थ अनुष्ठान नहीं, कर्तव्य है: उन्होंने बताया कि कानून और संवैधानिक वैधता को समझने का सबसे सरल माध्यम ‘धर्म’ है, जिसका अर्थ किसी पूजा-पाठ से नहीं बल्कि अपने नैतिक कर्तव्य के पालन से है।
  • कोर्टरूम की खामोशियों को समझना: जस्टिस संजय करोल ने कहा कि जजों को सिर्फ दलीलों के शब्दों को ही नहीं, बल्कि वकीलों और याचिकाकर्ताओं के बीच की खामोशी को भी सुनना और समझना आना चाहिए।
  • संवैधानिक कुर्सी की गरिमा: 1996 में सुप्रीम कोर्ट के कोर्टरूम नंबर 1 की अपनी पहली यात्रा को याद करते हुए उन्होंने कहा कि जब आप नीचे से बेंच को देखते हैं तो वह सत्ता का प्रतीक लगती है। लेकिन ऊपर बैठकर काम करने पर यह जिम्मेदारी और ईमानदारी का अहसास कराती है।

CJI सूर्यकांत ने सराहा जस्टिस संजय करोल का मानवीय दृष्टिकोण

मुख्य न्यायाधीश CJI सूर्यकांत ने विदाई समारोह में जस्टिस संजय करोल के मानवीय और दयालु दृष्टिकोण की जमकर तारीफ की। उन्होंने शिमला की एक घटना का उल्लेख करते हुए बताया कि कैसे जस्टिस करोल ने एक बार अपनी गाड़ी रोककर सड़क दुर्घटना में घायल हुए एक दूधवाले का तुरंत इलाज करवाया था।

CJI सूर्यकांत ने यह भी रेखांकित किया कि जस्टिस संजय करोल की अदालत कभी डरावनी नहीं रही, बल्कि वह हमेशा संवाद और मध्यस्थता को बढ़ावा देती थी। सुप्रीम कोर्ट में अपने 3.5 साल से अधिक के कार्यकाल के दौरान उन्होंने 270 से अधिक ऐतिहासिक फैसले लिखे। इनमें लिव-इन रिलेशनशिप में महिलाओं को क्रूरता के खिलाफ संरक्षण देने और गृहणियों के अवैतनिक कार्य को ‘राष्ट्र निर्माण’ मानते हुए मुआवजे का निर्धारण करने जैसे मानवीय फैसले शामिल हैं।

न्याय की मानवीय सीमाएं और शाश्वत सत्य का मार्ग

दैनिक समाचारों में हम देखते हैं कि बड़े से बड़े पदों पर बैठे व्यक्ति, चाहे वे न्यायाधीश हों, राजनेता हों या शीर्ष अधिकारी, अंततः अपनी मानवीय सीमाओं को स्वीकार करते हैं। जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में यही सत्य उजागर किया कि इंसान कितना भी विद्वान या शक्तिशाली क्यों न हो जाए, वह भगवान नहीं हो सकता और उससे गलतियां हो सकती हैं। भौतिक दुनिया में न्याय की अदालतें केवल सांसारिक विवादों को सुलझाने का प्रयास करती हैं, लेकिन वे मनुष्य के जीवन-मरण, कर्मबंधनों और अंतहीन दुखों का स्थायी समाधान नहीं कर सकतीं।

सांसारिक अदालतों में वकील और जज केवल बाहरी साक्ष्यों के आधार पर न्याय का प्रयास करते हैं, परंतु ईश्वर की दिव्य व्यवस्था में हर आत्मा के सूक्ष्म कर्मों का निष्पक्ष हिसाब होता है। पूर्ण संत संत रामपाल जी महाराज अपने आध्यात्मिक सत्संगों में समझाते हैं कि जब तक मनुष्य पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब की सत्य भक्ति और मर्यादापूर्वक साधना नहीं अपनाता, तब तक वह इस नश्वर संसार के दुखों और कर्मचक्र से मुक्त नहीं हो सकता।

सच्ची शांति, पूर्ण न्याय और अमर लोक (सतलोक) की प्राप्ति केवल तत्वदर्शी संत के मार्गदर्शन में ही संभव है। जहाँ सांसारिक पद और प्रतिष्ठा समय के साथ समाप्त हो जाते हैं, वहीं परमात्मा की सच्ची भक्ति जीव का लोक और परलोक दोनों सुधार देती है। आध्यात्मिक ज्ञान को गहराई से समझने और जीवन को सफल बनाने के लिए Sant Rampal Ji Maharaj Official YouTube Channel पर अवश्य जाएं और प्रामाणिक सत्संग सुनें।

FAQs on संजय करोल

प्रश्न 1: जस्टिस संजय करोल सुप्रीम कोर्ट से कब सेवानिवृत्त हुए?

उत्तर: जस्टिस संजय करोल 22 अगस्त 2026 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश पद से सेवानिवृत्त हुए। उनका कार्यकाल सुप्रीम कोर्ट में 3 साल और 6 महीने से अधिक का रहा।

प्रश्न 2: जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में क्या मुख्य बात कही?

उत्तर: जस्टिस संजय करोल ने अपने विदाई भाषण में कहा कि “जज भगवान नहीं होते” और उनसे हर फैसला सही होने की उम्मीद नहीं की जानी चाहिए। उन्होंने न्यायिक कार्य के लिए विनम्रता और याचिकाकर्ता के पीछे छिपे इंसान को देखने पर जोर दिया।

प्रश्न 3: जस्टिस संजय करोल सुप्रीम कोर्ट के जज कब बने थे?

उत्तर: जस्टिस संजय करोल को 6 फरवरी 2023 को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के रूप में पदोन्नत किया गया था। इससे पहले वे पटना और त्रिपुरा हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके थे।

प्रश्न 4: CJI सूर्यकांत ने जस्टिस संजय करोल के बारे में क्या विचार व्यक्त किए?

उत्तर: CJI सूर्यकांत ने जस्टिस संजय करोल के संवेदनशील और दयालु दृष्टिकोण की सराहना की। उन्होंने बताया कि जस्टिस करोल की अदालत हमेशा संवाद और निष्पक्ष सुनवाई के लिए जानी जाती थी।

प्रश्न 5: जस्टिस संजय करोल ने अपने कार्यकाल में कितने फैसले सुनाए?

उत्तर: सुप्रीम कोर्ट में अपने 3.5 साल से अधिक के कार्यकाल के दौरान जस्टिस संजय करोल ने 270 से अधिक फैसले लिखे, जिनमें कई महत्वपूर्ण सामाजिक और संवैधानिक मुद्दे शामिल थे।