भारतीय ट्रक ड्राइवर हरीश कुमार और उनके चार सदस्यीय परिवार को कनाडा सरकार ने 8 साल बाद देश से बाहर निकाल दिया है। कनाडा के क्यूबेक प्रांत में 2018 से रह रहे इस परिवार की शरणार्थी (रिफ्यूजी) अर्जी और मानवीय आधार पर दायर अपील को अधिकारियों ने खारिज कर दिया। इसके बाद परिवार को 7 सितंबर 2026 को मॉन्ट्रियल से भारत रवाना होना पड़ा।

यह मामला कनाडा की सख्त आव्रजन नीतियों और प्रवासी कामगारों के भविष्य पर एक गंभीर बहस छेड़ चुका है। पेश पेशेवर ट्रक ड्राइवर हरीश कुमार ने अपनी जान का खतरा बताते हुए कनाडा में कानूनी पनाह मांगी थी। उन्होंने कई वर्षों तक वहां ईमानदारी से काम किया और टैक्स चुकाया, इसके बावजूद प्रशासन ने उन्हें देश में ठहरने की इजाजत नहीं दी।

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जब देश को जरूरत थी तब बने ‘एसेंशियल वर्कर’, संकट टलते ही डिपोर्टेशन

कनाडा में काम करने वाले एक ट्रक ड्राइवर के तौर पर हरीश कुमार ने कोविड-19 महामारी के दौरान बेहद महत्वपूर्ण सेवाएं दी थीं। जब पूरी दुनिया लॉकडाउन के साए में घरों में बंद थी, तब हरीश सड़कों पर भारी वाहन चलाकर सुपरमार्केट और दवा दुकानों तक आवश्यक सामान पहुंचा रहे थे। उनकी पत्नी सोनिका भी स्थानीय स्तर पर काम कर परिवार का हाथ बंटा रही थीं।

प्रवासियों के अधिकारों के लिए लड़ने वाली संस्था ‘इमिग्रेंट वर्कर्स सेंटर’ (IWC) ने कनाडाई सरकार के इस फैसले का कड़ा विरोध किया है। संस्था के प्रतिनिधियों का कहना है कि जब कनाडाई अर्थव्यवस्था संकट में थी, तब सरकार ने उन्हें ‘एसेंशियल वर्कर’ घोषित किया। अब वही व्यवस्था उनकी मेहनत और सामुदायिक योगदान को नजरअंदाज कर उन्हें देश छोड़ने पर मजबूर कर रही है।

8 साल का कनाडाई सफर और कानूनी प्रक्रिया

हरीश कुमार के मामले में कानूनी लड़ाई आठ वर्षों तक विभिन्न स्तरों पर चली। इमिग्रेशन अधिकारियों और ट्रिब्यूनल के फैसलों का पूरा ब्योरा नीचे दी गई तालिका में देखा जा सकता है:

तारीख / वर्षघटनाक्रमपरिणाम / कानूनी प्रभाव
अगस्त 2017पंजाब के गोराया में राजनीतिक दबाव और कथित प्रताड़नाहरीश कुमार को जान का खतरा महसूस हुआ।
अप्रैल 2018परिवार सहित कनाडा (क्यूबेक) पहुंचेशरणार्थी (Asylum Claim) के रूप में संरक्षण की मांग रखी।
2019-2023वाणिज्यिक वाहन चलाने का काम शुरू कियामहामारी के दौरान आवश्यक आपूर्ति बहाल रखने में योगदान दिया।
4 अगस्त 2026रिफ्यूजी प्रोटेक्शन डिवीजन का अंतिम निर्णयशरणार्थी दावा और मानवीय आधार (H&C) अपील खारिज।
अगस्त 2026 अंतकनाडा बॉर्डर सर्विसेज एजेंसी (CBSA) की कार्रवाईपत्नी सोनिका को हिरासत में लिया गया।
7 सितंबर 2026मॉन्ट्रियल एयरपोर्ट से भारत वापसीकानूनी विकल्पों की समाप्ति के बाद वतन वापसी।

पंजाब से कनाडा तक: राजनीतिक विवाद और देश छोड़ने की मजबूरी

Change.org पर शुरू की गई एक नागरिक याचिका के अनुसार, हरीश कुमार पंजाब के जालंधर जिले के गोराया शहर में एक छोटी किराना दुकान चलाते थे। 2017 के दौरान स्थानीय चुनाव प्रचार के लिए कुछ राजनीतिक तत्वों ने उनसे जबरन चंदे की मांग की थी।

पैसे देने से इनकार करने पर उन्हें गंभीर परिणाम भुगतने की धमकियां मिलीं। याचिका में आरोप लगाया गया कि झूठे आरोप लगाकर उन्हें हिरासत में दिलवाया गया और गंभीर रूप से प्रताड़ित किया गया। लगातार असुरक्षा और धमकियों के चलते हरीश कुमार ने अपनी पत्नी और दो मासूम बेटों के साथ अप्रैल 2018 में भारत छोड़ दिया और कनाडा में पनाह ली।

मासूम बच्चों पर पड़ा सबसे भारी असर

इस निर्वासन की सबसे दर्दनाक मार हरीश के दो बेटों—14 वर्षीय जापेश और 12 वर्षीय गौराश पर पड़ी है। जापेश जब मात्र 6 वर्ष का था, तब कनाडा आया था। दोनों बच्चों ने अपना पूरा बचपन क्यूबेक में बिताया, वहां के स्कूलों में फ्रेंच सीखी और वहीं अपने दोस्त बनाए।

भारत लौटने से पहले मीडिया से बातचीत में जापेश ने रोते हुए बताया कि वे वहीं बड़े हुए हैं और भारत में उनका कोई परिचित नहीं है। छोटे बेटे गौराश का कहना था कि उन्हें एक ऐसे देश में नए सिरे से जिंदगी शुरू करनी पड़ेगी, जिसकी संस्कृति और भाषा उनके लिए पूरी तरह अजनबी हैं।

कनाडा की कानूनी धारा 48 और कड़ा होता इमिग्रेशन सिस्टम

कनाडा के इमिग्रेशन एंड रिफ्यूजी प्रोटेक्शन एक्ट (IRPA) की धारा 48 के तहत स्पष्ट नियम है कि एक बार जब रिमूवल ऑर्डर लागू हो जाता है, तो कानून प्रवर्तन एजेंसी को उस व्यक्ति को जितनी जल्दी हो सके निर्वासित करना होता है।

CBSA के अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि निष्कासन का फैसला हल्के में नहीं लिया जाता। आवेदक को इमिग्रेशन एंड रिफ्यूजी बोर्ड (IRB), फेडरल कोर्ट में न्यायिक समीक्षा और प्री-रिमूवल रिस्क असेसमेंट (PRRA) जैसे सभी कानूनी अवसर दिए जाते हैं। जब सभी कानूनी रास्ते बंद हो जाते हैं, तब निष्कासन अनिवार्य हो जाता है। आंकड़ों के मुताबिक, साल 2026 की पहली छमाही में कनाडा भर में जितने भी निर्वासन हुए, उनमें से 50 प्रतिशत से अधिक अकेले क्यूबेक प्रांत में दर्ज किए गए।

भौतिक संघर्षों से परे: जीवन की वास्तविक शरण और स्थायी शांति का मार्ग

कनाडा में आठ साल तक खून-पसीना बहाने के बाद एक ट्रक ड्राइवर और उसके परिवार को जिस बेबसी और उथल-पुथल का सामना करना पड़ा, वह इस संसार की अस्थायी प्रकृति का कड़वा सच उजागर करता है। इंसान सुख, शांति और सुरक्षा की तलाश में हजारों मील दूर सात समंदर पार चला जाता है, लेकिन वहां भी अनिश्चितता, तनाव और कानूनी संकट उसका पीछा नहीं छोड़ते। संसार का कोई भी देश या भौतिक संपत्ति मनुष्य को पूर्ण रक्षा और स्थायी आनंद प्रदान नहीं कर सकती।

संसार के इन अंतहीन क्लेशों, चिंताओं और संघर्षों का अंतिम समाधान पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी की सच्ची भक्ति और तत्वज्ञान में निहित है। जगतगुरु संत रामपाल जी महाराज अपने सत्संगों में शास्त्रों के गूढ़ प्रमाणों के साथ समझाते हैं कि यह काल का लोक है, जहां हर कदम पर दुख और अस्थिरता बनी रहती है। जब मनुष्य पूर्ण संत की शरण में आकर सतभक्ति को जीवन का आधार बनाता है, तभी कर्मों के जटिल बंधन कटते हैं और आत्मा को भयमुक्त जीवन मिलता है। संपूर्ण शांति और शाश्वत मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने के लिए प्रमाणिक आध्यात्मिक ज्ञान को समझना आवश्यक है।

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FAQs on “ट्रक ड्राइवर”

प्र.1: कनाडा से किस भारतीय ट्रक ड्राइवर को परिवार सहित निर्वासित किया गया है?

उत्तर: पंजाब के जालंधर स्थित गोराया निवासी हरीश कुमार को, जो क्यूबेक में एक ट्रक ड्राइवर के रूप में काम कर रहे थे, शरणार्थी याचिका खारिज होने के बाद 7 सितंबर 2026 को भारत डिपोर्ट किया गया।

प्र.2: हरीश कुमार ने कनाडा में शरणार्थी का दर्जा क्यों मांगा था?

उत्तर: एक ट्रक ड्राइवर के रूप में जीवन बिताने से पहले हरीश कुमार ने 2018 में दावा किया था कि पंजाब में स्थानीय राजनीतिक दबाव के कारण उनका जीवन भारत में सुरक्षित नहीं था।

प्र.3: कनाडा सरकार ने परिवार को देश से बाहर क्यों निकाला?

उत्तर: कनाडाई इमिग्रेशन अधिकारियों और अदालत ने उनके शरणार्थी दावे और मानवीय आधार पर दाखिल अपील को खारिज कर दिया। आव्रजन कानून की धारा 48 के तहत आदेश लागू होने पर CBSA ने उन्हें निर्वासित कर दिया।

प्र.4: महामारी के दौरान हरीश कुमार की क्या भूमिका थी?

उत्तर: कोविड-19 महामारी के दौरान हरीश ने कनाडा में आवश्यक वस्तुओं की ढुलाई करने वाले ट्रक ड्राइवर के रूप में काम किया था, जिसके कारण सामाजिक संगठनों ने उन्हें ‘एसेंशियल वर्कर’ का दर्जा दिया था।

प्र.5: क्या परिवार के पास कनाडा में अपील का कोई कानूनी रास्ता शेष था?

उत्तर: परिवार ने अंतिम राहत के लिए फेडरल कोर्ट में न्यायिक समीक्षा की मांग की थी, लेकिन निष्कासन आदेश पर कानूनी रोक न मिलने के कारण उन्हें निर्धारित समयसीमा में कनाडा छोड़ना पड़ा।