परमात्मा और देश के संविधान में अंतर!

किसी ने क्या खूब कहा है: गीता पे हिंदू, बाइबल पे क्रिश्चियन,और कुरान पर मुसलमान चलता है।
लेकिन संविधान एक ऐसा ग्रंथ है जिस पर पूरा देश चलता है। दोस्तों आज हम चर्चा करेंगे आने वाले गणतंत्र दिवस यानि 26 जनवरी की और संविधान की जो ईश्वर ने बनाया है। जो हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई सभी पर लागू होता है और जिसे मानने के लिए सभी समान रूप से बाध्य हैं।,

आज की इस खास पेशकश में आइए सबसे पहले जानते हैं आखिर संविधान होता क्या है?

दोस्तों ,संविधान लिखित नियमों की एक किताब है जिसे किसी देश में रहने वालें सभी लोग सामूहिक रूप से मानते है संविधान सर्वोच्च कानून है जो सरकार व नागरिक दोनों पर लागु होता है

परमात्मा और देश के संविधान में अंतर

दोस्तों अगर हम बात करे भारतीय संविधान की तो इसका निर्माण संविधान सभा जो चुने गए जनप्रतिनिधियों की सभा जिसने संविधान नामक दस्तावेज को लिखा इस सभा में 299 सदस्य थे भारतीय संविधान का निर्माण संविधान सभा द्वारा 2 वर्ष 11 महीने तथा 18 दिन मेँ किया गया था। संपूर्ण संविधान 26 जनवरी, 1950 को लागू किया गया था। 26 जनवरी, 1950 को भारत को गणतंत्र घोषित किया गया। संविधान नियमों और कानूनों का एक ऐसा संग्रह है जिससे मानव का सर्वांगीण विकास होता है। जो मनुष्य को उसके जीवन के मूल उद्देश्य और कर्तव्यो से अवगत कराता है|. दोस्तों संविधान में देश की सर्वोच्च विधायी संस्था द्वारा समय समय पर इसमें अपनी सुविधानुसार बदलाव करते रहते है.

दोस्तों, अब हम बात करते है परमेश्वर के बनाए इस विधान में कुछ नियम और मर्यादा की जिससे आज हम आपको अवगत कराएंगे। जिसका पहला नियम है –

सतगुरु की शरण ग्रहण करना

जो हमें परमेश्वर के विधान की जानकारी सही-सही दे, जो पाप कर्म करने से बचा दे और मूल उद्देश्य को दिखा दे वही सतगुरु होता है। आज विश्व भर में न जाने कितने ही गुरु मिल जाएंगे परन्तु एक समय में सत्तगुरु केवल एक ही होता है। जिसकी पहचान हम उनके द्वारा दिए गए तत्वज्ञान से कर सकते हैं। जिसका प्रमाण गीता ,कुरान सरीफ ,बाइबल और गुरु ग्रंथ साहेब में दिया है.

सविंधान का दूसरा नियम है: शास्त्रविरुद्ध साधना व्यर्थ है।

देश का संविधान जिससे आप जानते और पहचानते हैं और इस बात से भलीभांति परिचित हैं कि जो इस संविधान का उल्लंघन करेगा, उसे दंड भोगना होगा। ठीक उसी प्रकार परमेश्वर के बनाए विधान स्वरूप ग्रंथों के विपरीत भक्ति साधना करना नर्क का द्वार है

परमेश्वर के बनाए तीसरे नियम के अनुसार _सर्व नशीली वस्तुओं का सेवन निषेध है

परमेश्वर के बनाए विधान के अनुसार नशा करने वाला व्यक्ति कठोर दंड को भोक्ता है। क्योंकि प्रत्येक मनुष्य के अंदर ईश्वर का वास होता है जिसे हम नशा करके मलीन नहीं कर सकते। और अगर सरकार को देखे तो एक तरफ नशीली चीजों का सेवन करने का लाइसेंस देती है और एक तरफ कानून बनाती है, शराब के ठेके इसका स्टेक उदाहरण है

परमेश्वर के बनाए अगले नियम के अनुसार जीव हत्या करना पाप है

सपूर्ण सृष्टि की रचना एक परमेश्वर ने की है तथा सबको जीने का सामान अवसर मिला है। किसी जीव की हत्या करना परमेश्वर की विधान को तोड़ना है तथा ऐसा करने पर हम दंड के भागी हैं। और सरकार को देखें बूचड़खाने के लिए इजाजत दे कर जीव हत्या को बढ़ावा दे कर लोगों को पाप का भागी बनाती है.

आत्महत्या करना भी सविंधान के विरुद्ध है

संतों की वाणी से पता चलता है कि मनुष्य जन्म कितना दुर्लभ है और उसका उद्देश्य कितना खास है। इसलिए आत्महत्या करना अर्थात दंड का भागी होना है।

मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले ना बारम्बार ।
तरुर से पत्ता टूट गिरे, बहुर ना लगता डार

  • परमेश्वर का विधान हर बुराई का विरोध करता है पराई स्त्री पर गलत नजर रखने वालों की दुर्गति निश्चित है। परस्त्री को आयु अनुसार माता, बहन व बेटी के भाव से जानें।
  • चोरी, डकैती, ठग्गी, वेश्यागमन करना महाअपराध है। परमेश्वर के बनाए विधान के अनुसार चोरी ठगी धोखा देना तथा वेश्यावृत्ति महा अपराध है। तथा इस कार्य में सहयोग देने वालों के लिए भी उतनी ही सजा का प्रावधान है।
  • गाली देना, लड़ाई-झगड़ा करना, भेद-भाव, छुआछूत करना भगवान के सविंधान के खिलाफ है।
    लिंग, धर्म, जाति आदि के आधार पर किसी भी प्रकार का भेदभाव करना गलत है। परमेश्वर के विधान के अनुसार सभी प्राणियों को समान रूप से जीने का अधिकार प्राप्त है।
  • दहेज लेना व देना दोनों ही भगवान के सविंधान के अनुसार अपराध है। दहेज के कारण बेटियों को बोझ समझा जाने लगा जिस कारण से गर्भ में ही बेटियों की हत्या करने लगे जो दूसरा अपराध बन गया। विवाह के बाद बेटियों को दहेज के लिए प्रताड़ित करना दहेज के ही परिणाम है।सरकार इसके लिए कानून देहज निषेध अधिनियम 1961 बना तो दी पर इसका कठोरता से पालन न हो पाने के कारण आज लाखों बहनें आत्महत्या जैसा कदम उठा लेती है जो समाज के लिए कलंक है
  • निंदा करना, झूठ बोलना, राग-द्वेष करना भी पाप है।परन्तु समाज में देखे तो न यहां नागरिक बच पाए और न ही सरका
  • गर्भपात करना: महापाप है।

भगवान का सविंधान कहता है कि जीव हत्या चाहे किसी भी जीव यानी मनुष्य या पशु-पक्षी, कीट-पतंग किसी की भी हो महापाप का भागी बनता है।
यह है परमेश्वर का बनाया विधान जिसे सभी धर्मों के लोग मानने के लिए बाध्य है।

अब विचार करने वाली बात यह है कि

भगवान को संविधान क्यों बनाना पड़ा? और जीव इसे मानने के लिए बाध्य क्यों है जिस प्रकार राष्ट्र को चलाने के लिए संविधान जरूरत पड़ती है ठीक उसी प्रकार सृष्टि को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियम कानून और मर्यादा की आवश्यकता हुई। और प्रत्येक व्यक्ति इसे मानने के लिए इसलिए बाध्य है क्योंकि इसमें हमारा मनुष्य जीवन का मूल उद्देश्य निहित है। इन नियमों पर चलकर हम पूर्ण मोक्ष को प्राप्त कर सकते हैं तथा अपने निजधाम सत्यलोक को जा सकते हैं।

Video Credit: SA News Channel

अब आप सबके मन में यह प्रश्न जरूर उठ रहा होगा कि देश का संविधान तोड़ने पर भारी जुर्माना, जेल की कैद या मृत्यु दंड जैसी सजाएं मिलती हैं तो भगवान का संविधान तोड़ने पर क्या सजा मिलती होगी? यह बात सत्य है की परिणाम ही हमें कानून को मानने के लिए मजबूर करता है। तो आइए जानते हैं परमेश्वर के विधान को तोड़ना किस प्रकार हमारे लिए हानिकारक है।

गुरु बिन होम यज्ञ जो करहीं, मिथ्या जाए कबहु न फलहिं।।
मानुष जन्म पाएकर, जो नहीं रटे हरि नाम।
जैसे कुँआ जल बिना, बनवाया किस काम।।

जैसा कि हम जान चुके हैं मनुष्य जीवन का एक खास उद्देश्य है, सतलोक में वास। जिसे सत भक्ति द्वारा प्राप्त किया जा सकता है ऐसा नहीं करने पर हमारा मनुष्य जीवन व्यर्थ है।

नर से तू फिर पशुआ कीजै, गधा बैल बनाई।
छप्पन भोग कहाँ मन बौरे, कहीं कुरड़ी चरने जाई।।

जो लोग शास्त्रविरुद्ध साधना करते हैं उनका कभी मोक्ष नही हो पाता। और गधे, बैल आदि के जीवन में महाकष्ट भोगते है।

मदिरा पीवे कडुवा पानी, सत्तर जन्म श्वान के जानी।।

जो शराब पीते हैं वो सत्तर जन्म तक कुत्ते का जन्म प्राप्त करके दर-दर की ठोकर खाते हैं और महाकष्ट भोगते हैं।


सुरापान मद मांसाहारी, गमन करे भोगे पर नारी।
सत्तर जन्म कटेंगे शीषम्, साक्षी साहेब है जगदीशम।।
गरीब, भांग तम्बाखू पीव हीं, सुरापान से हेत।
गोश्त मट्टी खाय कर, जंगली बनें प्रेत।।

नशा, मदिरा सेवन, परस्त्री भोगने व मांस खाने वालों के सत्तर जन्म तक मनुष्य, बकरा-बकरी या मुर्गा-मुर्गी आदि के जीवनों में सिर कटते हैं।
नशीली वस्तुओं का सेवन करने वाले प्रेत जन्म प्राप्त करते हैं।


गरीब परद्वारा स्त्री का खोले, सत्तर जन्म अंधा हो डोले।
जो परस्त्री के साथ दुर्व्यवहार करते हैं वे सत्तर जन्म तक अंधे का जीवन पाते हैं।


कबीर, चोरी जारी वैश्या वृति, कबहु न करियो कोए।
पुण्य पाई नर देही, ओच्छी ठोर न खोए।।


जो चोरी, डकैती, ठग्गी, वेश्यागमन करते हैं परमात्मा के दरबार में उनको कठिन दंड दिया जाएगा।


कबीर, तिनका कबहु न निंदिये जो पाएँ तले हो।
कभी उठ आँख में पड़े, तो पीड़ घनेरी हो।।


इस देहि को देवा लोचे, तू नर क्यों उकलाता।

आत्महत्या करने वाले भी संविधान के अनुसार पाप के भागी बनते हैं। इस मनुष्य की देह को देवता भी चाहते हैं और जो इस देहि से उकलाकर इसे नष्ट करते हैं वे महापापी हैं।

इस प्रकार भगवान के संविधान के खिलाफ जाने वालों को इस जन्म के साथ साथ अगले जन्मों में महाकष्ट भोगना पड़ता है जो देश के संविधान को तोड़ने से मिलने वाली सजा से भी भयानक है।

दोस्तों भगवान का संविधान बताने वाले स्वयं भगवान होते हैं या उनके द्वारा भेजा कोई सन्त या महापुरुष होता है। आज के दिन केवल एक ही महान सन्त इस पृथ्वी पर मौजूद है जिसे सतगुरु व तत्वदर्शी सन्त कह सकते हैं। वह सन्त और कोई नही बल्कि जगतगुरु तत्वदर्शी सन्त रामपाल जी महाराज जी ही हैं जिन्होंने हमें भगवान के संविधान से परिचित करवाया और संविधान तोड़ने पर मिलने वाले कष्टों से अवगत करवाया। आज का मनुष्य बहुत भाग्यशाली है क्योंकि मनुष्य जन्म भी प्राप्त है, पृथ्वी पर सतगुरु भी विद्यमान है।

अतः आप सभी से अनुरोध है कि ऐसा स्वर्ण मौका बार बार नही मिलता है। इसलिए सतगुरु रामपाल जी महाराज जी द्वारा बताए गए तत्वज्ञान को अपने धार्मिक ग्रंथों से मिलान करके, ज्ञान को परख कर मनुष्य जन्म के रहते जल्दी से जल्दी उनकी शरण ग्रहण करें और अपना और अपने परिवार का कल्याण करवाएं।

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