बैटरी-रहित चिकित्सा उपकरणों में क्रांति: लंदन/ब्रैडफोर्ड, UK – चिकित्सा तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी छलांग के रूप में, भारतीय मूल की वैज्ञानिक डॉ. अरथिराम रामचंद्रा कुरुप ससीकला को यूनाइटेड किंगडम के “UK रिसर्च एंड इनोवेशन (UKRI)” द्वारा £3 मिलियन (लगभग ₹31 करोड़) की फंडिंग प्राप्त हुई है। यह फंडिंग उन्हें अगली चार वर्षों तक बैटरी-रहित मेडिकल इम्प्लांट्स विकसित करने के लिए प्रदान की गई है, जो शरीर की गति से स्वयं ऊर्जा उत्पन्न कर सकेंगे।

बैटरी-रहित चिकित्सा उपकरणों में क्रांति भारतीय मूल की वैज्ञानिक को UK से £3 मिलियन फंडिंग

शोध का उद्देश्य और तकनीकी दृष्टिकोण

पीजोइलेक्ट्रिक तकनीक का उपयोग

यह उपकरण पीजोइलेक्ट्रिक बायोमैटेरियल्स पर आधारित होंगे — जो यांत्रिक दबाव (जैसे चलना, सांस लेना या धड़कन) से बिजली उत्पन्न करते हैं। इन इम्प्लांट्स में कोई बैटरी नहीं होगी। शरीर की सामान्य क्रियाएं जैसे चलना या हृदय की धड़कन इन उपकरणों को आवश्यक ऊर्जा प्रदान करेंगी।

मुख्य संभावित उपयोग

  • पेसमेकर, जिन्हें हर 5–10 वर्षों में बैटरी बदलने के लिए ऑपरेशन की आवश्यकता होती है, अब लंबे समय तक चल सकते हैं
  • हड्डी-उपचार और न्यूरोइम्प्लांट्स को निरंतर ऊर्जा मिल सकेगी
  • बैटरियों की जगह शरीर को ऊर्जा स्रोत बनाने से सर्जरी कम होगी, लागत घटेगी और पर्यावरणीय प्रभाव भी कम होगा

डॉ. अरथिराम का सफर

केरल के एक गाँव से निकलकर यूनाइटेड किंगडम तक पहुंचने वाली डॉ. अरथिराम की कहानी प्रेरणादायक है। उन्होंने UK की यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रैडफोर्ड में बायोमेडिकल इंजीनियरिंग में विशेषज्ञता प्राप्त की।

इस शोध में उनके साथ कैंब्रिज यूनिवर्सिटी और UC सैन डिएगो जैसे संस्थानों की सहभागिता होगी। उनके शोध को “मेडिकल टेक्नोलॉजी में क्रांतिकारी” माना जा रहा है।

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बैटरी-रहित चिकित्सा से वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रभाव

रोगियों की सुरक्षा

पुनः ऑपरेशन की आवश्यकता में भारी कमी आएगी।

बैटरी-रहित चिकित्सा से वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली पर प्रभाव

लागत में बचत और स्थायित्व

इन उपकरणों से अस्पतालों की लागत घटेगी और दीर्घकालिक स्थायित्व बढ़ेगा।

विकासशील देशों में संभावनाएं

जहां नियमित बैटरी बदलना कठिन होता है, वहां ये उपकरण बहुत मददगार साबित होंगे।

तकनीकी और नैतिक चुनौतियाँ

  • शरीर से पर्याप्त ऊर्जा प्राप्त करना और उसे स्थिर रूप में उपकरणों तक पहुंचाना एक बड़ी चुनौती है
  • नियामक अनुमोदन, क्लीनिकल ट्रायल्स और गुणवत्ता परीक्षण में वर्षों लग सकते हैं
  • तकनीक के आमजन तक पहुंचने के लिए मूल्य निर्धारण और निष्पक्ष वितरण को सुनिश्चित करना होगा

आध्यात्मिक संतुलन के साथ नवाचार की दिशा

जब चिकित्सा विज्ञान ऐसी तकनीकों की ओर बढ़ता है जो शरीर की प्राकृतिक गतियों से ऊर्जा उत्पन्न कर उपकरणों को संचालित करती हैं, तो यह केवल वैज्ञानिक प्रगति नहीं बल्कि मानव-केन्द्रित सोच का संकेत भी है। संत रामपाल जी महाराज की सतज्ञान शिक्षाएँ इस बिंदु पर एक महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि देती हैं—कि असली प्रगति वही है जो न केवल तकनीकी समाधान प्रस्तुत करे, बल्कि जीवन को सरल, सुरक्षित और समाजोपयोगी भी बनाए।

डॉ. अरथिराम का यह शोध केवल चिकित्सा नवाचार नहीं, बल्कि उस विचारधारा का हिस्सा है जिसमें विज्ञान, सेवा और आध्यात्मिक उद्देश्य एक-दूसरे के पूरक बनते हैं। यह विज्ञान की वह दिशा है जो मानव सेवा की भावना से प्रेरित है और भविष्य की चिकित्सा को सतभक्ति-संगत और नैतिक संतुलन के साथ परिभाषित कर सकती है।

आगे की योजना

  • यह परियोजना अगले चार वर्षों तक चलेगी
  • वर्ष 2026–27 तक प्रोटोटाइप और प्रारंभिक परीक्षण संभव हैं
  • क्लिनिकल उपयोग में आने के लिए 2028–29 तक अनुमोदन आवश्यक होगा
  • इस तकनीक के सफल होने पर अन्य क्षेत्रों में भी बैटरी-रहित डिवाइसेज़ की संभावना बनेगी — जैसे न्यूरोलॉजी, ऑर्थोपेडिक्स और ह्यूमन–मशीन इंटरफेस

FAQs: बैटरी-रहित मेडिकल इम्प्लांट्स

Q1. यह अनुदान कितने का है और किसे मिला?

£3 मिलियन का अनुदान डॉ. अरथिराम रामचंद्रा को मिला है।

Q2. यह तकनीक कैसे काम करेगी?

यह शरीर की गति से उत्पन्न यांत्रिक ऊर्जा को बिजली में बदलकर इम्प्लांट्स को पावर देगी।

Q3. इसका लाभ क्या होगा?

बार-बार सर्जरी की आवश्यकता नहीं, पर्यावरणीय प्रभाव में कमी, और अधिक सुरक्षा।

Q4. यह कब तक रोगियों तक पहुँच सकती है?

2026–27 तक प्रोटोटाइप, और 2028–29 तक वास्तविक उपयोग की संभावना है।

Q5. इसमें कौन से देश या संस्थान शामिल हैं?

UK (ब्रैडफोर्ड यूनिवर्सिटी), कैंब्रिज और UC सैन डिएगो इस प्रोजेक्ट में साझेदार हैं।