Tokyo 2020 Paralympic Games [Hindi]: पैरालंपिक खेलों की सम्पूर्ण जानकारी

नमस्कार दर्शकों! खबरों की खबर का सच स्पेशल कार्यक्रम में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। आज के कार्यक्रम में हम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खेली गई पैरालिंपिक खेल प्रतियोगिता, 2021 (Tokyo 2020 Paralympic Games) के बारे में चर्चा करेंगे और साथ ही इस प्रतियोगिता से जुड़ी तमाम खास बातें भी आपको बताएंगे। दोस्तों! जब बात पैरा एथलीट या खिलाड़ियों की हो, तो बात हौसलों के भी आगे की होती है। बात सिर्फ चुनौतियों का सामना करने की नहीं है बल्कि एक बहुत बड़ी जंग जीतने की है। एक ऐसी जंग जो पहले ख़ुद से लड़नी होती है, उसके बाद समाज के , विकलांगों के प्रति रवैए से, और अंत में खेल के मैदान में खुद को साबित करने की।

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दोस्तों पैरालिंपिक खेल प्रतियोगिता अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजित होने वाली एक बहु-खेल प्रतियोगिता है जिसमें शारीरिक और मानसिक रूप से विकलांग खिलाड़ी भाग लेते हैं। पैरालिंपिक एथलीट छह अलग-अलग विकलांगता समूहों में प्रतिस्पर्धा करते हैं, जैसे amputee सेरेब्रल पाल्सी, स्पाइनल कॉर्ड इंजरीज़, विजुअल इंपेयरमेंट, बौद्धिक विकलांगता, और “लेस ऑट्रेस”, जिसमें ऐसे ऐथलीटों को शामिल किया जाता है जिनकी विकलांगता अन्य श्रेणियों में से एक में भी फिट नहीं होती है। प्रत्येक समूह के भीतर, एथलीटों को उनकी अक्षमताओं के प्रकार और सीमा के आधार पर आगे कक्षाओं में विभाजित किया जाता है। यदि उनकी शारीरिक स्थिति में परिवर्तन होता है तो व्यक्तिगत एथलीटों को बाद की प्रतियोगिताओं में पुनरर्वर्गीकृत किया जा सकता है।

Tokyo 2020 Paralympic Games: पैरालिंपिक खेल प्रतियोगिता, 2021

इस साल जापान में आयोजित की गई ओलंपिक्स खेल प्रतियोगिता के समापन के बाद जापान की राजधानी टोक्यो में 24 अगस्त से 5 सितंबर, 2021 के बीच इस प्रतियोगिता को आयोजित किया गया था। जिसमे भारत को बड़ी सफलता प्राप्त हुई है। भारतीय पैरालिंपिक विजेताओं ने हाल ही में संपन्न हुए टोक्यो पैरालिंपिक में कुल 19 पदक अर्जित किए, जो देश के अब तक के सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन को चिह्नित करता है। ओवरऑल टैली के बाद भारत का स्थान पूरे विश्व में 24वें नंबर पर रहा। इस साल भारत को कुल 5 स्वर्ण, 8 रजत और 6 कांस्य पदक हासिल हुए है। पदक प्राप्त करने वालों की सूची में 3 महिलाएं भी शामिल हैं। टोक्यो पैरालिंपिक में भारतीय पैरालिंपिक विजेताओं के प्रदर्शन की प्रशंसा आज पूरा देश कर रहा है। इस वर्ष बैडमिंटन, टेबल टेनिस, हाई जंप, डिस्कस थ्रो, ज्वेलिन थ्रो, लॉन्ग जंप, शूटिंग और आर्चरी जैसे खेलों में भारतीय खिलाड़ियों ने बहुत ही शानदार तरीक़े से खेल खेले हैं। पदक हासिल करने वाले खिलाड़ियों के लिए राज्य सरकारों ने व केंद्र सरकार ने अलग अलग प्रकार के इनामों की भी घोषणा की है।

इस साल भारत के 54 खिलाड़ियों ने पैरालिंपिक खेलों में भाग लिया था जिनमे से 19 ने पदक हासिल करने में सफलता पाई है। जिनके नाम इस प्रकार हैं— Bhavina patel, Nishad Kumar, Avani Lekhara, Devendra Jhajharia, Sundar Singh Gurjar, Yogesh Kathuniya, Sumit Antil, Singhraj Adhana, Mariyappan Thangalvelu, Sharad Kumar, Pravin Kumar, Avani Lekhara, Harvinder Singh, Manish Narwal, Singhraj Adhana, Pramod Bhagat, Manoj Sarkar, Suhas Yathiraj, Krishna Nagar
(इनके नामों की लिस्ट दिखाएं बोलें नहीं)

भारत में पैराएथलीटों को दी जाने वाली सुविधाओं में काफ़ी सुधार हुआ है

लेकिन इनके सामने चुनौतियाँ और संसाधनों की कमी अब भीे व्याप्त हैं। जिन केंद्रों में सामान्य ख़िलाड़ी अभ्यास करते हैं, उन्हीं स्टेडियमों में पैरा ख़िलाड़ी भी अपने विशेष प्रशिक्षकों के साथ तैयारी करते हैं।

भारतीय पैरालिंपिक संघ की अध्यक्ष “दीपा मलिक” के अनुसार, “भारत सरकार ने 17 करोड़ रुपए पैरा खिलड़ियों के प्रशिक्षण, विदेशी दौरे और उन्हें सुविधाएँ प्रदान करने में खर्च किए हैं.” दीपा का कहना है कि सरकार की ‘टॉप्स स्कीम’ का खिलाड़ियों को काफ़ी फ़ायदा हुआ है। कोरोना महामारी के कारण लगे लॉकडाउन के दौरान, चाहे लाखों रुपए की व्हील चेयर हों या टेबल टेनिस की टेबल,इन सब चुनौतियों के बावजूद खिलाड़ियों को काफ़ी कुछ मुहैय्या करवाया गया। दीपा का मानना है, “अब जिस चीज़ की सबसे अधिक ज़रूरत है, वो है अच्छे कोच और अच्छी ट्रेनिंग जैसी सुविधाएँ.”देने की।

पैरालिंपिक खेल (Tokyo 2020 Paralympic Games) प्रतियोगिता का इतिहास

आइए अब यह जानते हैं कि इस प्रतियोगिता की शुरुआत कब और कैसे हुई थी?

पैरालिंपिक खेलों (Tokyo 2020 Paralympic Games) की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के घायल सैनिकों को फिर से मुख्यधारा में लाने के मकसद से हुई थी। स्पाइनल इंज्यूरी के शिकार सैनिकों को ठीक करने के लिए खास तौर से इसे शुरू किया गया था। साल 1948 में द्वितीय विश्व युद्ध में घायल हुए सैनिकों की स्पाइनल इंजुरी को ठीक करने के लिए ‘स्टोक मानडेविल अस्पताल’ में काम कर रहे न्यूरोलॉजिस्ट “सर गुडविंग गुट्टमान” ने इस रिहेबिलेशन कार्यक्रम के लिए स्पोर्ट्स को चुना था। इन खेलों को तब ‘अंतरराष्ट्रीय व्हीलचेयर गेम्स का नाम दिया गया था।’

जब सन 1948 में लंदन में ओलंपिक खेलों का आयोजन हुआ, तब उसके साथ ही अस्पताल के मरीजों के साथ एक स्पोर्ट्स कंपीटिशन की भी शुरुआत की गई, जिसे लोगों द्वारा काफ़ी पसंद किया गया। फिर देखते ही देखते डॉक्टर गुट्टमान के इस अनोखे तरीके को ब्रिटेन के कई स्पाइनल इंज्यूरी युनिट्स ने अपनाया और एक दशक तक स्पाइनल इंज्यूरी को ठीक करने के लिए ये रिहेबिलेशन प्रोग्राम चलता रहा। इस खेल का आयोजन एक बार फिर सन 1952 में किया गया। इस बार ब्रिटिश सैनिकों के साथ डच सैनिकों ने भी हिस्सा लिया। इस तरह इसने पैरालिंपिक खेल के लिए एक मैदान तैयार कर दिया।

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साल 1960 में इटली की राजधानी रोम में पहली बार पैरालिंपिक खेल का आयोजन किया गया। इसमें सैनिकों के साथ आम लोग भी भाग ले सकते थे। पहले पैरालिंपिक खेलों में 23 देशों के 400 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया था। शुरुआती पैरालिंपिक खेलों में तैराकी को छोड़कर खिलाड़ी सिर्फ व्हीलचेयर के साथ ही भाग ले सकते थे लेकिन सन 1976 में दूसरे तरह के पैरा लोगों को भी पैरालिंपिक में भाग लेने के लिए आमंत्रित किया गया। वहीं से शुरुआत हुई मॉर्डन पैरालिंपिक खेलों की।

कब किया जाता है पैरालिंपिक खेल (Tokyo 2020 Paralympic Games) का आयोजन?

पैरालिंपिक खेल (Tokyo 2020 Paralympic Games), विकलांग एथलीटों के लिए प्रमुख अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता मानी जाती है। ओलंपिक खेलों की तुलना में, पैरालिंपिक को शीतकालीन खेलों और ग्रीष्मकालीन खेलों में विभाजित किया जाता है, जिसे विंटर पैरालिंपिक्स और समर पैरालिंपिक भी कहा जाता है, जो बारी-बारी से हर दो साल में आयोजित किए जाते हैं। अल्पाइन स्कीइंग, क्रॉस-कंट्री स्कीइंग, और शीतकालीन खेलों के लिए बायथलॉन और ग्रीष्मकालीन खेलों के लिए साइकिल चलाना, तीरंदाजी और तैराकी आदि ओलंपिक्स खेलों का पैरालिंपिक्स में भी समावेश किया जाता है। हालांकि पैरालिंपिक के लिए खेल उपकरण विशिष्ट अक्षमताओं के लिए संशोधित किए जा सकते हैं। 20वीं सदी के अंत से पैरालिंपिक उसी शहर में आयोजित किए जाते रहे हैं जो संबंधित ओलंपिक खेलों की मेजबानी करता है; ओलंपिक समाप्त होने के तुरंत बाद पैरालिंपिक का आयोजन किया जाता है। अंतर्राष्ट्रीय पैरालिंपिक समिति, जिसे 1989 में जर्मनी में स्थापित किया गया था वह पैरालिंपिक खेलों को नियंत्रित करती है।

पहली बार 1964 में जापान ने की थी पैरालिंपिक खेलों की मेज़बानी

ब्रिटेन के “मार्गेट माघन” पैरालिंपिक खेलों में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले एथलीट बने। उन्होंने तीरंदाज़ी में गोल्ड मेडल हासिल किया था। साल 1964 में ओलंपिक जापान की राजधानी टोक्यो में आयोजित किया गया और कुछ ही समय बाद जापान ने पैरालिंपिक खेलों की मेज़बानी में अहम भूमिका निभाई। ये पहला मौका था जब जापान में पैरा एथलीटों ने व्हीलचेयर के साथ कई खेलों में हिस्सा लिया था। उसके बाद से यह खेल ओलंपिक्स खेल प्रतियोगिता की भांति हर 4 साल में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आयोजित किया जाता है, जिसमे विकलांग खिलाड़ी हिस्सा लेते है।

इस प्रतियोगिता में ग्रेडिंग कैसे तय होती है?

पैरा खिलाड़ियों को उनकी शारीरिक स्थिति के आधार पर श्रेणीबद्ध किया जाता है। मान लीजिए कि शॉटपुट खेल में भाग लेने वाले पाँच खिलाड़ी हैं। उनमें से दो ऐसे हैं, जिनके केवल हाथ में विकलांगता है और तीन ऐसे हैं जिनके पूरे बाज़ू में ही विकलांगता है, तो उनको अलग-अलग श्रेणियों में रखा जाएगा ताकि मुकाबला बराबरी का रहे। जिस तरह ओलंपिक खिलाड़ियों का वज़न और लिंग के आधार पर वर्गीकरण किया जाता है, उसी तरह पैरा खिलड़ियों में इस बात का ध्यान रखा जाता है कि उनकी शारीरिक स्थिति उनके खेल को किस हद तक प्रभावित कर रही है, यही उनकी श्रेणी को तय करता है।

किस खिलाड़ी को ‘पैरा खिलाड़ी’ माना भी जाएगा या नहीं, इसके 10 मानदंड होते हैं-

1) मांसपेशियों की दुर्बलता, 2) जोड़ों की गति की निष्क्रियता, 3) किसी अंग में कोई कमी, 4) टांगों की लम्बाई में फ़र्क़, 5) छोटा क़द, 6) हाइपरटोनिया यानी मांसपेशियों में जकड़न, 7) शरीर के मूवमेंट पर नियंत्रण की कमी 8) एथेटोसिस यानी हाथ-पैरों की उँगलियों की धीमी मंद गति, 9) नज़र में ख़राबी और 10) सीखने की अवरुद्ध क्षमता.

एफ़ यानी फ़ील्ड की प्रतियोगिताएं जैसे शॉटपुट, जेवलिन थ्रो, डिसकस थ्रो इसमें भी विकलांगता के हिसाब से लगभग 31 श्रेणियाँ होती हैं। वहीं टी यानी ट्रैक की प्रतियोगिताएँ- जैसे रेस और जंप. इसमें 19 श्रेणियाँ होती हैं। इनमे नंबर बदलता हुआ नज़र आता है – जैसे, एफ़-32,33,34,35… तो समझिए कि जितना कम नंबर है उतनी ही अधिक विकलांगता है।

इसके अलावा, तीरंदाज़ी, बैडमिंटन, साइकिलिंग, निशानेबाज़ी, ताइक्वांडो, जूडो तथा चार व्हीलचेयर के खेल — बास्केटबॉल, रग्बी, टेनिस और फ़ेंसिंग (fencing) भी पैरालंपिक में शामिल हैं। व्हील चेयर पर खेले जाने वाले खेल डब्ल्यूएच-1 या डब्ल्यूएच-2 के नाम से जाने जाते हैं। इनमें से जो खेल खड़े होकर खेले जाते हैं, वो एस से शुरू होते है, जिसे स्टैंडिंग कहा जाता हैं। अगर एस के आगे एल लिखा है, तो मतलब शरीर के निचले हिस्से — लोअर लिंब में दिक्क़त है और अगर एस के आगे यू लिखा है, तो मतलब शरीर के ऊपर के हिस्से यानि अपर लिंब में विकलांगता है।

इन मानदंडों के चलते कैसे होता है पैरा खिलाडि़यों का चयन?

सामान्य खेलों की तरह पैरा गेम्स में भी एक न्यूनतम योग्यता मानदंड —एमईसी होता है, जैसे शॉटपुट में 10 मीटर और जेवलिन थ्रो में 40 मीटर जैसा एक लक्ष्य निश्चित किया जाता है। इंटरनेशनल पैरालिंपिक कमेटी — आईपीसी ये मानक तय करती हैं। लेकिन ये जरूरी नहीं कि अगर खिलाड़ी ने इस लक्ष्य को हासिल कर लिया तो उसे क्वालीफ़ाइड मान लिया जाएगा। आईपीसी हर एक देश को एक कोटा देता है और उससे ज्यादा ख़िलाड़ी भाग नहीं ले सकते। अगर कोटे से अधिक ख़िलाड़ी एमईसी हासिल कर लें, तो हर देश उन खिलाड़ियों के बीच फ़ाइनल सेलेक्शन ट्रायल करवाता है। इसके अलावा, विश्व रैंकिंग के आधार पर भी खिलाड़ियों का चयन होता है।

आइए अब आध्यात्मिक दृष्टिकोण से यह जानते है की मनुष्य जीवन प्राप्त करने के लिए आत्मा का चयन किस प्रकार होता है, और क्या कारण है की कुछ लोग विकलांग पैदा हो जाते है और जीवन भर शारीरिक या मानसिक कष्ट उठाने के लिए मजबूर होते हैं?

दोस्तों! सभी धर्मो के पवित्र सद्ग्रंथ यह बताते है की मनुष्य जीवन बहुत ही दुर्लभ है। यह 84 लाख प्रकार के प्राणियों के शरीर में जीवन मरण भोगने के बाद एक बार प्राप्त होता है। इसके अलावा पूर्ण परमात्मा का संविधान हमें यह चेतावनी देता है की बार बार नही पाओगे, मनुष्य जन्म की मौज।

इसी विषय में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी अपनी अमृतमयी वाणी में बताते है,

मानुष जन्म दुर्लभ है, मिले न बारम्बार।
तरुवर से पत्ता टूट गिरे, वो बहुर न लगता डार।।

क्या आप जानते हैं कि मनुष्य जीवन को प्राप्त करने के लिए देवी देवता भी तरसते हैं। लेकिन इस मनुष्य जीवन में किसी को जन्म से ही विकलांगता प्राप्त होती है तो कोई जन्म लेने के पश्चात विकलांग हो जाता है। पवित्र वेद बताते है की यह सब कष्ट प्राणी को पिछले जन्मों के पाप कर्म के कारण भोगना पड़ता है। जो प्राणी शारीरिक या मानसिक कष्ट सह रहे है या विकलांगता से ग्रस्त है वे अपने पिछले जन्मों के पाप कर्म का भोग, भोग रहे है। इसका उपाय वर्तमान समय में जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज ने अपने सत्संगो में बताया है। संत रामपाल जी ने बताया है की पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी पाप कर्म दंड को समाप्त कर सकता है और प्राणी पर आए हुए और आने वाले सभी कष्टों को समाप्त कर उसे सर्व सुख प्रदान कर सकता है। संत रामपाल जी महाराज जी की शरण में आए लाखों अनुयाइयों को केवल नियम और मर्यादा में रहकर शास्त्र अनुसार सतभक्ति करने से शारीरिक व मानसिक कष्टों से छुटकारा मिला है। यहां तक की कई विकलांग व्यक्तियों के शरीर के अंग भी पुनः यानी पहले की भांति कार्य करने लग गए है।

क्या पैरालिंपिक्स खिलाड़ी भी अन्य अनुयायियों की तरह शारीरिक व मानसिक लाभ प्राप्त कर सकते है?

जवाब है हां, बिलकुल लाभ प्राप्त कर सकते है। पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी बताते है की मनुष्य जीवन केवल सदभक्ति करने के लिए प्राप्त होता है। सतभक्ति करने के अलावा किया गया हर एक कार्य व्यर्थ है। कबीर साहेब जी अपनी अमृतवाणी में बताते है,

कबीर, मानुष जन्म पाय कर जो नही रटे हरी नाम।
जैसे कुवां जल बिना फिर बनवाया किस काम।।

संत रामपाल जी महाराज बताते है की, मनुष्य शरीर प्राप्त प्राणी चाहे वो स्त्री, पुरुष, नपुंसक, हिजड़ा ,वैश्या या विकलांग है, वह मोक्ष प्राप्त करने वाली प्रतियोगिता में स्वतः ही क्वालीफाई हो जाते है। इन्हे बस पूर्ण संत / तत्वदर्शी संत से नाम दीक्षा लेकर सतभक्ति करने के नियम और मर्यादा का पालन करना होता है। जिससे उनको मनुष्य जन्म में मिल रहे सभी कष्टों का निवारण हो सकता है और मृत्यु के पश्चात मोक्ष भी प्राप्त हो सकता है। वर्तमान समय में पूरे विश्व में केवल संत रामपाल जी महाराज ही इस खेल के सच्चे कोच यानी सतगुरु हैं जो सभी मनुष्यों को इस खेल में स्वर्ण पदक यानी मोक्ष प्राप्त करवा सकते है। इस वीडियो को देखने वाले सभी भाई बहनों से प्रार्थना है की संत रामपाल जी महाराज जी से नाम दीक्षा लेकर सतभक्ति करें और अपना कल्याण करवाएं।

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