अक्षय कुमार बनाम सम्राट पृथ्वीराज घिरे विवादों में

पृथ्वीराज चौहान [Hindi] अक्षय कुमार बनाम सम्राट पृथ्वीराज घिरे विवादों में

नमस्कार दर्शकों! खबरों की खबर का सच स्पेशल कार्यक्रम में आप सभी का एक बार फिर से स्वागत है। आज की हमारी स्पेशल पड़ताल में हम चर्चा करेंगे अक्षय कुमार की हाल ही में रीलीज़ हुई फिल्म “सम्राट पृथ्वीराज (पृथ्वीराज चौहान) ” की और साथ ही जानेंगे कि समाज से वैरभाव और मज़हबी रंजिश को हमेशा के लिए कैसे समाप्त करें।

दोस्तों! हाल ही में बॉलीवुड के मशहूर सुपरस्टार अक्षय कुमार की फिल्म‌ “सम्राट पृथ्वीराज” रिलीज़ हुई जिसकी दर्शकों फिल्म समीक्षकों और इतिहासकारों द्वारा काफी आलोचना की जा रही है।
चंद्रप्रकाश द्विवेदी द्वारा निर्देशित सम्राट पृथ्वीराज चौहान पर बनी यह फिल्म मशहूर कविता पृथ्वीराज रासो पर आधारित है, जिसे चंद बरदाई ने लिखा था। फिल्म में अक्षय कुमार, मानुषी छिल्लर और सोनू सूद अहम भूमिका में हैं। विवादों के चलते इस फिल्म की रिलीज़ को ओमान और कुवैत जैसे देशों में बैन कर दिया गया था। फिल्म सम्राट पृथ्वीराज’ पर काम शुरू करने से पहले फिल्म निर्माताओं ने इस विषय पर शोध करने में एक दशक से अधिक समय लगाया है लेकिन इसके बावजूद फिल्म में एतिहासिक तथ्यों के साथ की गई छेड़छाड़ को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सम्राट पृथ्वीराज” फिल्म की कहानी के बारे में

अजमेर के राजा पृथ्वीराज (अक्षय कुमार) को दिल्ली का राजा बनाया जाना उनके संबंधी और कन्नौज के राजा जयचंद (आशुतोष राणा) को रास नहीं आता। यही नहीं सम्राट पृथ्वीराज खुद से प्रेम करने वाली जयचंद की बेटी संयोगिता (मानुषी छिल्लर) को भी स्वयंवर के मंडप से उठा लाते हैं। इससे अपमानित जयचंद तराइन के पहले युद्ध में पृथ्वीराज के हाथों शिकस्त हासिल कर चुके गजनी के सुलतान मोहम्मद गोरी (मानव विज) को पृथ्वीराज को धोखे से बंदी बनाकर उसे सौंप देने की चाल चलता है

सम्राट पृथ्वीराज और मोहम्मद गोरी की लड़ाई को लेकर कईं कहानियां प्रचलित हैं, लेकिन इस फिल्म के मुताबिक सम्राट पृथ्वीराज, मोहम्मद गोरी को सबक सिखाते हैं। अक्षय जैसे बड़े सितारे को देखने सिनेमाहाल में उम्मीद से भी कम दर्शक पहुंचे। पृथ्‍वीराज चौहान की कहानी बयां करती फिल्‍म ‘सम्राट पृथ्‍वीराज’ ने सभी को निराश किया है।

कौन थे पृथ्वीराज चौहान?

पृथ्वीराज तृतीय (शासनकाल: 1178–1192) जिन्हें आम तौर पर पृथ्वीराज चौहान कहा जाता है, चौहान वंश के राजा थे। उन्होंने वर्तमान उत्तर-पश्चिमी भारत में पारम्परिक चौहान क्षेत्र सपादलक्ष पर शासन किया। उन्होंने वर्तमान राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, पंजाब, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से पर भी नियन्त्रण किया। उनकी राजधानी अजयमेरु (आधुनिक अजमेर) में स्थित थी, हालाँकि मध्ययुगीन लोक किंवदन्तियों ने उन्हें भारत के राजनीतिक केंद्र दिल्ली के राजा के रूप में वर्णित किया है जो उन्हें पूर्व-इस्लामी भारतीय शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में चित्रित करते हैं।

फिल्म को लेकर क्या क्या विवाद उठ रहे है?

  • फिल्म में पृथ्वीराज चौहान को राजपूत सम्राट बताने पर गुर्जर समाज सोशल मीडिया पर विरोध कर रहा है।
  • वहीं, दूसरी तरफ करणी सेना, जो राजपूत समुदाय का प्रतिनिधित्व करती है, उन्होंने मेकर्स के सामने ये मांग रखी कि फिल्म पृथ्वीराज का टाइटल बदला जाए। करणी सेना ने मेकर्स को धमकी दी थी कि अगर फिल्म का टाइटल सम्राट पृथ्वीराज नहीं किया गया, तो वह फिल्म की रिलीज़ का विरोध करेंगे। हालांकि, करणी सेना की इस धमकी के बाद फिल्म के मेकर्स को अक्षय की पृथ्वीराज का नाम बदलकर सम्राट पृथ्वीराज करना पड़ा।
  • इसके अलावा कुछ लोग फिल्म में हिंदी और संस्कृत शब्दों की जगह उर्दू और फारसी शब्दों के अधिक इस्तेमाल का भी विरोध कर रहे हैं।
  • इसके अलावा अक्षय कुमार का बयान भी विवादों में हैं। अक्षय का कहना है कि इतिहास लिखने वालों ने हिंदू राजाओं से भेदभाव किया और जितना गुणगान मुगल शासकों का किया जाता है वैसे पृथ्वीराज चौहान जैसे वीर सपूतों का नहीं होता।
  • साथ ही फिल्म के पोस्टर घोषणा करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान ‘भारत के अंतिम हिंदू राजा’ थे जो सही नहीं है। बहुत से लोगों का मानना है कि पृथ्वीराज चौहान न तो अंतिम ‘हिंदू’ राजा थे और न ही भारत के अंतिम शासक।

सम्राट पृथ्वीराज की जाति को लेकर छिड़ा विवाद दिल्ली हाई कोर्ट पहुंचा

पृथ्वीराज गुर्जर हैं या राजपूत, इसे लेकर गुर्जर समाज सर्व संगठन ने दिल्ली हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। एक न्यूज चैनल (ndtv) की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले की सुनवाई करते हुए एक्टिंग चीफ जस्टिस विपिन सांघी और जस्टिस सचिन दत्ता ने याचिका को खारिज कर दिया और अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि फिल्म में जाति से जुड़ा कुछ भी नहीं है। यह फिल्म कास्ट न्यूट्रल है, जिसमें ये कहीं भी नहीं कहा गया है कि सम्राट पृथ्वीराज गुर्जर थे या राजपूत। वहीं पिछले कुछ दिनों में उत्तरप्रदेश के शामली जिले में गढ़ीपुख्ता थाना क्षेत्र के गांव दुल्लाखेड़ी में पृथ्वीराज चौहान की एक मूर्ति के अनावरण को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। जिसमें सम्राट पृथ्वीराज को राजपूत बताया गया है जिसका विरोध गुर्जर समाज के लोग सोशल मीडिया पर कर रहे है।

फिल्म के विवादों में घिरने का एक कारण सही रिसर्च वर्क नहीं होना भी है

दोस्तों!। इतिहासकारों के मुताबिक सम्राट पृथ्वीराज की मौत 1192 में और मोहम्मद शहाबुद्दीन घौरी की मौत 1206 में हुई थी। मगर फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे पहले दिवंगत हुए पृथ्वीराज ने 14 साल बाद मोहम्मद घौरी को एक लड़ाई में मार गिराया। हालांकि सभी शिक्षाविद और इतिहासकार इस बात से सहमत नहीं हैं।

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इतिहासकार इस तथ्य को प्रमाणिकता के साथ स्वीकार करते हैं कि पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन मोहम्मद गौरी के बीच दो जबरदस्त युद्ध हुए थे। पहले युद्ध में पृथ्वीराज चौहान ने मोहम्मद गौरी को बुरी तरह हरा दिया था और परास्त हुए गौरी को सेना समेत वापस अफगानिस्तान भागना पड़ा था। इतिहासकारों के मुताबिक दूसरे युद्ध में गौरी कि सेना जीत गई और युद्ध स्थल से कुछ दूर पृथ्वीराज चौहान का पीछा कर उन्हें कत्ल कर दिया गया। प्रसिद्ध इतिहासकार इरफान हबीब के मुताबिक पृथ्वीराज चौहान और शहाबुद्दीन गौरी (मोहम्मद गौरी) के बीच पहला युद्ध तराइन में 1191 में हुआ।

पहले युद्ध में पृथ्वीराज की विजय हुई और शहाबुद्दीन गौरी पराजित होकर अपने बची कुची सेना समेत अपने मुल्क अफगानिस्तान भाग गया। वहीं दूसरी ओर शहाबुद्दीन गौरी को 1206 में सिंधु नदी के किनारे मारा गया। इतिहासकार अपने इस तथ्य के माध्यम से बताते हैं कि पृथ्वीराज चौहान और मोहम्मद गौरी दोनों की मृत्यु के बीच कई वर्षों का अंतर था।

प्रत्येक महापुरुष का जीवन देता है बेहतर जीने की सीख

हालांकि पृथ्वीराज चौहान के वास्तविक जीवन की बात करें तो इसे स्पष्ट कर पाना सभी इतिहासकारों और रिसर्चरों के लिए भी मुश्किल है। लेकिन 100 बातों की एक बात तो ये है की इतिहास के किसी भी महापुरुष के जीवन से आज हम सभी मनुष्यों को कुछ न कुछ सीख अवश्य लेनी चाहिए।

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हम महान शासक सिकंदर के जीवन को देख सकते हैं। आपको ये जानकर आश्चर्य होगा कि मौत को हराने का दावा करने वाले सिकंदर, मरने से पहले मौत से डर गए थे। सिकंदर को पता चल गया था कि जीत, धन दौलत, अहंकार, घमंड सिर्फ एक जूठ है, जबकि सत्य सिर्फ मृत्यु है। सिकंदर की मृत्य से पहले की आखरी तीन ख्वाहिशें कुछ इस प्रकार थी:

  • पहली ख्वाहिश: जिन हकीमों ने मेरा इलाज किया, वे सारे मेरे जनाज़े को कंधा देंगे, ताकि दुनिया को पता चल सके कि रोग का इलाज करने वाले हकीम भी मौत को नहीं हरा सकते।
  • दूसरी ख्वाहिश: जनाज़े की राह में वो सारी दौलत बिछा दी जाए जो उसने ज़िन्दगी भर इकट्ठा की थी। ताकि सबको ये पता चले कि जब मौत आती है तो ये दौलत भी काम नहीं आती।
  • तीसरी ख्वाहिश: महान सिकंदर का जनाज़ा जब निकाला जाए तो उसके दोनों हथेली बाहर की ओर लटकाए जाएं, ताकि लोगों को पता चले कि इंसान धरती पर खाली हाथ आता है और खाली हाथ जाता है।

जिस मृत्यु से सिकंदर डर गया और दूसरों को सीख दे गया उसके विषय में पूर्ण परमात्मा कबीर साहेब जी ने कहा है,

जिस मरनै से जग डरै, मेरे मन आनंद।
कब मरिहूँ कब पावहुं, वो पूरन परमानंद।।

कबीर साहेब जी बताते हैं की मनुष्यों को चाहिए की पूर्ण सतगुरु से दीक्षा लेकर पूर्ण परमात्मा की सत्य भक्ति साधना करें, जिससे यदि मौत भी जब दस्तक दे, तब भी उनकी रक्षा हो जाए। सतभक्ति न करने वाले प्राणी मनुष्य जीवन के मूल उद्देश्य को प्राप्त करने से वंचित रह जाते हैं और अपने अनमोल जीवन को व्यर्थ गंवा देते हैं। इस संसार का अटल नियम है की जो जन्मता है वह अवश्य ही मरता है। इसलिए सभी को अपनी मृत्यु अवश्य याद रखनी चाहिए और परमात्मा के डर से पूर्ण सतगुरु की खोज करनी चाहिए।

दर्शक स्वयं विचार करें की किसी मुगल या हिन्दू शासक की जाति, मज़हब, युद्ध, हार जीत और पारिवारिक इतिहास पर बनाई गई फिल्म के कारण यदि वर्तमान में विश्वभर में रह रहे लोगों के जीवन में लड़ाई झगड़े, अशांति, जातिगत व धार्मिक भेदभाव और दंगे जैसी स्थिति पैदा होती है तो ऐसी फिल्में बनाने और देखने से क्या लाभ।

बताया जा रहा है कि इस फिल्म को बनाने में 300 करोड़ रूपए से अधिक का खर्चा आया और इस पर कई वर्षों का रिसर्च वर्क करना पड़ा परंतु अंत में केवल निंदा , विवाद और फैलियर ही हाथ लगा। फिल्में देखने और बनाने से समाज का और विश्व का कोई खास भला नहीं होता साथ ही समय और धन की बर्बादी होती है।

जबकि हम सभी मनुष्यों को अपने अनमोल समय को संतों द्वारा बताए गए आध्यात्मिक ज्ञान को सुनने और उस पर अमल करने में लगाना चाहिए जिससे आपसी रंजिश, मज़हबी वैरभाव , धार्मिक असंतोष और ईर्ष्या समाप्त हो सके।

वर्तमान समय में पूर्ण सतगुरु “जगतगुरु तत्वदर्शी संत रामपाल जी महाराज जी के पास ऐसे सत्य भक्ति मंत्र हैं जो साधक का हर कष्ट समाप्त कर सकतेे हैं व मृत्यु के बाद मोक्ष प्रदान कर साधक को अमर बना देते हैं।

इस विडियो को देखने वाले हमारे सभी दर्शकों से प्रार्थना है कि फिल्में देखकर और उस पर झगड़ा करके अपना अनमोल जीवन व्यर्थ न करें। संत रामपाल जी महाराज जी से नामदीक्षा लेकर सतभक्ति करें और अपना कल्याण करवाएं।

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