Mahashivratri यानी शिव और पार्वती जी के विवाह की वर्षगांठ (Anniversary)

महाशिवरात्रि (Mahashivratri Puja in Hindi) इस बार 11 मार्च, 2021 को त्रयोदशी तिथि गुरुवार के दिन मनाई जाएगी। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का व्रत किया जाता है। इस महाशिवरात्रि, 2021 पर जानिए देवताओं में सबसे प्रिय शिव और देवियों में श्रेष्ठ मानी जाने वाली देवी पार्वती जी के जीवन से जुड़े यथार्थ पहलू। हमारा उद्देश्य किसी भी देवी-देवता व भगवानों के चरित्र को धूमिल करना नहीं है बल्कि आपको उनके बारे में सदग्रंथों में लिखित सत्य जानकारी से रूबरू कराना है ताकि आप सत्यभक्ति करना आरंभ करें और मनमानी भक्ति को त्याग दें।

Mahashivratri Puja in Hindi क्यों मनाई जाती है महाशिवरात्रि

शिवरात्रि और महाशिवरात्रि में क्या अंतर होता है?

Table of Contents

हिंदू पंचांग के अनुसार, जब प्रदोष श्रावण महीने में आता है तो बड़ी शिवरात्रि मनाई जाती है। हर महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को शिवरात्रि कहते हैं। फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि को पड़ने वाली शिवरात्रि को महाशिवरात्रि कहा जाता है। वर्ष भर में 12 शिवरात्रियां आती हैं और इनमें से महाशिवरात्रि की बहुत अधिक मान्यता है।

क्या शिवजी और पार्वती जी की पूजा धर्म ग्रंथ गीता अनुसार करना सही है?

कबीर साहेब जी जो पूर्ण परमात्मा और तीनों गुणों (ब्रह्मा, विष्णु और शिव) के दादा हैं धर्मदास जी से जिंदा महात्मा के रूप में आकर मिले और सतज्ञान समझाया। तत्वज्ञान समझने के दौरान धर्मदास जी ने कबीर साहेब जी से बहुत प्रश्न किए। तीनों गुणों, कालब्रह्म, दुर्गा, सृष्टि रचना और गीता ज्ञान से संबंधित प्रश्न पूछे।

प्रश्न :- धर्मदास जी ने पूछा कि क्या श्री विष्णु जी और शंकर जी की पूजा करनी चाहिए?

उत्तर :- (जिन्दा बाबा का) :- नहीं करनी चाहिए।

प्रश्न :- (धर्मदास जी का) :- कृपया गीता से प्रमाणित कीजिए।

उत्तर :- श्रीमद्भगवत गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15, 20 से 23 तथा गीता अध्याय 9 श्लोक 23-24, गीता अध्याय 17 श्लोक 1 से 6 में प्रमाण है कि जो व्यक्ति रजगुण ब्रह्मा, सतगुण विष्णु तथा तमगुण शिव की भक्ति करते हैं, वे राक्षस स्वभाव को धारण किए हुए मनुष्यों में नीच, दूषित कर्म करने वाले मूर्ख मुझे भी नहीं भजते। (यह प्रमाण गीता अध्याय 7 श्लोक 12 से 15 में है। फिर गीता अध्याय 7 के ही श्लोक 20 से 23 तथा गीता अध्याय 9 श्लोक 23-24 में यही कहा है और क्षर पुरुष, अक्षर पुरुष तथा परम अक्षर पुरुष गीता अध्याय 15 श्लोक 16-17 में जिनका वर्णन है), को छोड़कर श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शिव जी अन्य देवताओं में गिने जाते हैं। इन दोनों अध्यायों (गीता अध्याय 7 तथा अध्याय 9 में) में ऊपर लिखे श्लोकों में गीता ज्ञान दाता ने कहा है कि जो साधक जिस भी उद्देश्य को लेकर अन्य देवताओं को भजते हैं, वे भगवान समझकर भजते हैं। उन देवताओं को मैंने कुछ शक्ति प्रदान कर रखी है। देवताओं के भजने वालों को मेरे द्वारा किए विधान से कुछ लाभ मिलता है। परन्तु उन अल्प बुद्धिवालों का वह फल नाशवान होता है। देवताओं को पूजने वाले देवताओं के लोक में जाते हैं। मेरे पुजारी मुझे प्राप्त होते हैं।

क्या महामृत्युंजय इत्यादि जैसे सभी जाप करना सही हैं?

गीता अध्याय 16 श्लोक 23-24 में कहा है कि शास्त्रविधि को त्यागकर जो साधक मनमाना आचरण करते हैं अर्थात् जिन देवताओं, पितरों, यक्षों, भैरों-भूतों की भक्ति करते हैं और मनकल्पित मन्त्रों का जाप करते हैं, उनको न तो कोई सुख होता है, न कोई सिद्धि प्राप्त होती है तथा न उनकी गति अर्थात् मोक्ष होता है। इससे तेरे लिए हे अर्जुन! कर्त्तव्य (जो भक्ति करनी चाहिए) और अकर्त्तव्य (जो भक्ति न करनी चाहिए) की व्यवस्था में शास्त्र ही प्रमाण हैं। गीता अध्याय 17 श्लोक 1 में अर्जुन ने पूछा कि हे कृष्ण! (क्योंकि अर्जुन मान रहा था कि श्री कृष्ण ही ज्ञान सुना रहा है, परन्तु श्री कृष्ण के शरीर में प्रेत की तरह प्रवेश करके काल (ब्रह्म) ज्ञान बोल रहा था।

जो व्यक्ति शास्त्रविधि को त्यागकर अन्य देवताओं आदि की पूजा करते हैं, वे स्वभाव में कैसे होते हैं?

गीता ज्ञान दाता ने उत्तर दिया कि सात्विक व्यक्ति देवताओं का पूजन करते हैं। राजसी व्यक्ति यक्षों व राक्षसों की पूजा तथा तामसी व्यक्ति प्रेत आदि की पूजा करते हैं। ये सब शास्त्रविधि रहित कर्म हैं। फिर गीता अध्याय 17 श्लोक 5-6 में कहा है कि जो मनुष्य शास्त्राविधि से रहित केवल मनकल्पित घोर तप को तपते हैं, वे दम्भी (अभिमानी) हैं और शरीर के कमलों में विराजमान शक्तियों को तथा मुझे भी क्रश करने वाले राक्षस स्वभाव के अज्ञानी जान। सूक्ष्मवेद में कबीर परमेश्वर जी ने कहा है किः-

‘‘कबीर, माई मसानी सेढ़ शीतला भैरव भूत हनुमंत।
परमात्मा से न्यारा रहै, जो इनको पूजंत।।
राम भजै तो राम मिलै, देव भजै सो देव।
भूत भजै सो भूत भवै, सुनो सकल सुर भेव।।‘‘

स्पष्ट हुआ कि श्री ब्रह्मा जी (रजगुण), श्री विष्णु जी (सत्गुण) तथा श्री शिवजी (तमगुण) की पूजा (भक्ति) नहीं करनी चाहिए तथा इसके साथ-साथ भूतों, पितरों की पूजा, (श्राद्ध कर्म, तेरहवीं, पिण्डोदक क्रिया, सब प्रेत पूजा होती है) भैरव तथा हनुमान जी की पूजा भी नहीं करनी चाहिए।

धर्मदास को प्रभु ने सुनाया, गीता शास्त्र से प्रत्यक्ष प्रमाण देखकर धर्मदास की आँखें खुली की खुली रह गई। जैसे किसी को सदमा लग गया हो। झूठ कह नहीं सकता, स्वीकार करने के लिए अभी वक्त लगेगा।

जिन्दा रुपधारी परमेश्वर ने धर्मदास को सम्बोधित करते हुए कहा कि हे वैष्णव महात्मा! कौन-सी दुनिया में चले गये, लौट आओ। मानो धर्मदास नींद से जागा हो। सावधान होकर कहा, कुछ नहीं-कुछ नहीं। कृपया और ज्ञान सुनाओ ताकि मेरा भ्रम दूर हो। परमेश्वर कबीर जी ने सृष्टि की रचना धर्मदास जी को सुनाई। ( पाठकों से निवेदन है संत रामपाल जी महाराज द्वारा लिखित पुस्तक ज्ञान गंगा अवश्य मंगवाकर पढ़ें)। सृष्टि रचना सुनकर धर्मदास जी को ऐसा लगा मानो पागल हो जाऊँगा क्योंकि जो ज्ञान आजतक हिन्दू धर्मगुरुओं, ऋषियों, महर्षियों-सन्तों से सुना था, वह निराधार तथा अप्रमाणित लग रहा था। जिन्दा बाबा हिन्दू सद्ग्रन्थों से ही प्रमाणित कर रहे थे। शंका का कोई स्थान नहीं था। मन-मन में सोच रहा था कि कहीं मैं पागल तो नहीं हो जाऊँगा?

अंत में सभी शंकाओं का समाधान पाकर धर्मदास जी कबीर साहेब जी के परम शिष्य बने और इन्हीं से कबीर पंथ का आरंभ हुआ।

ब्रह्मा, विष्णु और शिव भगवान नहीं हैं?

श्री शिव महापुराण विद्येश्वर संहिता अध्याय 6 से 9 में (अनुवाद कर्ता विद्यावारिधि पं. ज्वाला प्रसाद जी मिश्र, प्रकाशक=खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाशन बम्बई- 400004 पृष्ठ 11.13-14‘‘:- शिव पुराण से प्रमाण

  • (1) सदाशिव अर्थात् काल रूपी ब्रह्म, श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री महेश जी का जनक (पिता) है
  • (2) प्रकृति अर्थात् दुर्गा जिसकी आठ भुजाएं हैं यह श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री शंकर (रूद्र) जी की जननी (माता) है।
  • (3) दुर्गा को प्रधान, प्रकृति, शिवा भी कहा जाता है।
  • (4) श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री महेश ईश (भगवान) नहीं हैं क्योंकि खेमराज श्रीकृष्णदास प्रकाशन बम्बई वाली श्री शिवपुराण में श्री शिव अर्थात् काल ब्रह्म ने कहा है कि हे ब्रह्मा तथा विष्णु तुमने अपने आप को ईश (भगवान) माना है यह ठीक नहीं है अर्थात् तुम प्रभु नहीं हो।
  • (5) श्री शिव अर्थात् काल ब्रह्म से भिन्न तथा इसी के आधीन तीनों देवता (ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश/रूद्र) हैं।
  • (6) श्री ब्रह्मा, विष्णु ने जो उपाधी प्राप्त की है यह तप करके प्राप्त की है। जो ब्रह्म काल अर्थात् सदाशिव द्वारा तप के प्रतिफल में प्रदान की गई है।
  • (7) सदाशिव अर्थात् महाशिव ही ब्रह्म है यही काल रूपी ब्रह्म है। दुर्गा ने अपनी शब्द (वचन) शक्ति से सावित्री, लक्ष्मी, पार्वती को उत्पन्न किया।
  • (8) श्री ब्रह्मा जी से सावित्री, श्री विष्णु जी से लक्ष्मी तथा श्री महेश/रूद्र से पार्वती/काली का विवाह किया गया।
  • (9) श्री ब्रह्मा, श्री विष्णु तथा श्री महेश को क्षमा करने का अधिकार नहीं है। केवल कर्म फल ही प्रदान कर सकते हैं।
  • (10) श्री ब्रह्मा रजगुण, श्री विष्णु सतगुण तथा श्री महेश/रूद्र तमगुण युक्त हैं।

मां दुर्गा ने शिव जी का विवाह पार्वती जी से किया था

देवी दुर्गा जी ने अपने तीनों पुत्रों (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का विवाह किया था, श्री देवीपुराण के तीसरे स्कंद में प्रमाण है कि इस ब्रह्माण्ड के प्रारम्भ में तीनों देवताओं (श्री ब्रह्मा जी, श्री विष्णु जी तथा श्री शिव जी) का जब इनकी माता श्री दुर्गा जी ने विवाह किया, उस समय न कोई
बाराती था, न कोई भाती था। न कोई भोजन-भण्डारा किया गया था। न डी.जे बजा था, न कोई नृत्य किया गया था। श्री दुर्गा जी ने अपने बड़े पुत्र श्री ब्रह्मा जी से कहा कि हे ब्रह्मा! यह सावित्री नाम की लड़की तुझे तेरी पत्नी रूप में दी जाती है। इसे ले जाओ और अपना घर बसाओ। इसी प्रकार अपने बीच वाले पुत्र श्री विष्णु जी से लक्ष्मी जी तथा छोटे बेटे श्री शिव जी को पार्वती जी को देकर कहा कि ये तुम्हारी पत्नियां हैं। इनको ले जाओ और अपना-अपना घर बसाओ। तीनों अपनी-अपनी पत्नियों को लेकर अपने-अपने लोक में चले गए जिससे विश्व का विस्तार हुआ। तीनों ने भोग विलास किया, सुर तथा असुर दोनों पैदा हुए। (पार्वती जी ने 108 बार पार्वती रूप में जन्म लिया और कर्म फल अनुसार हर बार शिव ही उनके वर बने)।

शिव जी भस्मासुर से डर कर अपनी जान बचाने के लिए भागे थे

जिस समय भस्मासुर ने तप करके भस्मकण्डा श्री शिव जी से वचनबद्ध करके ले लिया था। तब भस्मासुर ने शिव से कहा कि मैं तेरे को भस्म करूँगा। तेरे को मारकर तेरी पत्नी पार्वती को अपनी पत्नी बनाऊँगा। तब भय के कारण श्री शिव जी भाग लिए। भस्मासुर में भी सिद्धियां थी। वह भी साथ दौड़ा। शिवजी भय के कारण अधिक गति से दौड़ रहे थे। भस्मासुर भी पीछे पीछे दौड़ रहा था तभी उसी मोड़ पर परमात्मा ने पार्वती रूप धारण किया और पार्वती रूप में उसके सामने आकर खड़ी हो गए। पार्वती ने उसका हाथ पकड़कर कहा क्यों भाग रहे हो मेरे साथ नाचो। भस्मासुर तो पार्वती जी पर ही मोहित था।

पार्वती रूप में परमात्मा ने कहा गंडहथ नृत्य करते समय हाथ सिर पर करना होता है। भस्मासुर का भस्मकण्डे वाला हाथ भस्मासुर के सिर पर करने को पार्वती ने कहा कि इस नृत्य में दायां हाथ सिर पर करते हैं। ज्यों ही भस्मासुर ने भस्मकण्डे वाला हाथ सिर पर किया तो युवती ने बोला भस्म। उसी समय भस्मासुर जलकर नष्ट हो गया। वह युवती भगवान स्वयं ही शिव शंकर की जान की रक्षा के लिए बने थे।, परंतु महिमा विष्णु को दी। विष्णु रूप में प्रकट होकर परमात्मा उस भस्मकण्डे को लेकर श्री शिव के सामने खडे़ हो गए तथा शिव से कहा हे शिव इतने तेज़ क्यों दौड़ रहे हो? शिव ने सब बात बताई कि आप भी दौड़ जाओ।

भस्मासुर मुझे मारने को मेरे पीछे लगा है। तब विष्णु रूपधारी परमात्मा ने कहा कि देख! आपका भस्मकण्डा मेरे पास है। शिव ने तुरंत पहचान लिया और रूककर पूछा कि यह आपको कैसे मिला? शिव को विश्वास नहीं हो रहा था कि उग्र रूप धारण किए भस्मासुर से कैसे ये भस्मकण्डा लिया। तब परमात्मा ने कहा कि फिर बताऊँगा। इतना कहकर अंतर्ध्यान (अदृश्य) हो गए।

जब पार्वती जी अपने पति शिव से रूठकर पिता के घर चली गई थीं

पार्वती जी अपने पति भगवान शिव से रूठकर पिता दक्ष के घर चली आई तो राजा दक्ष उस समय यज्ञ करवा रहे थे। बहुत बड़े हवन कुंड में हवन चल रहा था। राजा दक्ष ने उसका आदर नहीं किया क्योंकि उसने शिव जी के साथ विवाह पिता की इच्छा के विरूद्ध किया था। राजा दक्ष ने हवन कर रखा था। हवन कुण्ड में छलाँग लगाकर सती जी ने प्राणान्त कर दिया था। शंकर जी को पता चला तो अपनी ससुराल आए। राजा दक्ष का सिर काटा, फिर उस पर बकरे का सिर लगाया। भगवान शिव करीब 10 हज़ार वर्षों तक पार्वती जी के कंकाल को लिए घूमते रहे। तब श्री विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से उस कंकाल के टुकड़े-टुकड़े कर दिया। बावन (52) टुकड़े हो गए जो कहीं-कहीं पर गिरे। सती जी के शरीर के भाग कई अलग-अलग जगहों पर गिरे। जहाँ देवी जी का धड़ वाला भाग गिरा वहाँ पर लोगों ने देवी के धड़ को दफनाकर ऊपर मंदिरनुमा यादगार बनाई जिससे वैष्णो देवी मंदिर की स्थापना हुई।

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इसी प्रकार जहाँ पार्वती जी की आंखों वाला शरीर का भाग गिरा वहाँ पर उसी तरह उसे जमीन में दफनाकर नैना देवी मंदिर बना दिया ताकि घटना का प्रमाण रहे। हिमाचल के कांगड़ा जिले में जहाँ देवी जी की अधजली जीभ वाला भाग गिरा वह ज्वालादेवी नाम से प्रसिद्ध हुआ। जिस स्थान पर पार्वती जी की नाभि वाला शरीर का भाग गिरा वो अन्नपूर्णा देवी नाम के मंदिर से प्रसिद्ध हुआ। देवी जी की यादगार में 52 द्वार/मंदिर अलग-अलग स्थानों पर बनाए गए। इन तीर्थ स्थानों पर भगवान प्राप्ति के उद्देश्य से जाना और पर्यटन स्थलों पर भ्रमण पर जाना एक समान है‌।

शिव जी को भ्रम हुआ कि उन्होंने काम देवता को भस्म कर दिया

जब शंकर जी सचेत हुए तथा अपनी दुर्गति का कारण कामदेव को माना। कामदेव वश हो जाए तो न स्त्री की आवश्यकता हो और न ऐसी परेशानी हो। यह विचार करके हजारों वर्ष काम का दमन करने के उद्देश्य से तप किया। एक दिन कामदेव उनके निकट आया और शंकर जी की दृष्टि से भस्म हो गया। शंकर जी को अपनी सफलता पर असीम प्रसन्नता हुई। जो भी देव उनके पास आता था तो उससे कहते थे कि मैंने कामदेव को भस्म कर दिया है यानि काम विषय पर विजय प्राप्त कर ली है। मैं कभी भी किसी सुंदरी से प्रभावित नहीं हो सकता।

जब विष्णु जी को, शिव जी को दिखाना पड़ा मोहिनी रूप

काल ब्रह्म को चिंता बनी कि यदि सब इस प्रकार स्त्री से घृणा करेंगे तो संसार का अंत हो जाएगा। मेरे लिए एक लाख मानव का आहार कहाँ से आएगा? इस उद्देश्य से नारद जी को प्रेरित किया। एक दिन नारद मुनि जी आए। उनके सामने भी अपनी कामदेव पर विजय की कथा सुनाई। नारद जी ने भगवान विष्णु को यथावत सुनाई। श्री विष्णु जी को काल ब्रह्म ने प्रेरणा की। भाई की परीक्षा करनी चाहिए कि ये कितने खरे हैं। काल ब्रह्म की प्रेरणा से एक दिन शिव जी विष्णु जी के घर के आँगन में आकर बैठ गए। सामने बहुत बड़ा फलदार वृक्षों का बाग था। भिन्न-भिन्न प्रकार के फूल खिले थे। बसंत जैसा मौसम था। श्री विष्णु जी, शिव जी के पास बैठ गए। कुशलमंगल जाना। फिर विष्णु जी ने पूछा, सुना है कि आपने काम पर विजय प्राप्ति कर ली है। शिव जी बोले, हाँ, मैंने कामदेव का नाश कर दिया है। कुछ देर बाद शिव जी के मन में प्रेरणा हुई कि भगवान मैंने सुना है कि सागर मंथन के समय आप जी ने मोहिनी रूप बनाकर राक्षसों को आकर्षित किया था। आप उस रूप में कैसे लग रहे थे? मैं देखना चाहता हूँ। पहले तो बहुत बार विष्णु जी ने मना किया।

परंतु शिव जी के हठ के सामने स्वीकार किया और कहा कि कभी फिर आना। आज मुझे किसी आवश्यक कार्य से कहीं जाना है। यह कहकर विष्णु जी अपने महल में चले गए। शिव जी ने कहा कि जब तक आप वह रूप नहीं दिखाओगे, मैं भी जाने वाला नहीं हूँ। कुछ ही समय के बाद शिव जी की दृष्टि बाग के एक दूर वाले कोने में एक अपसरा पर पड़ी जो सुन्दरता का सूर्य थी। इधर-उधर देखकर शिव जी उसकी ओर चले पड़े, ज्यों-ज्यों निकट गए तो वह सुंदरी अधिक सुंदर लगने लगी । सुंदरी ऐसे भाव दिखा रही थी कि जैसे उसको कोई नहीं देख रहा। जब शिव जी को निकट देखा तो शर्मशार होकर तेज चाल से चल पड़ी।

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शिव जी ने भी गति बढ़ा दी। बड़े परिश्रम के पश्चात् तथा घने वृक्षों के बीच मोहिनी का हाथ पकड़ पाए। तब तक शिव जी का शुक्रपात हो चुका था। उसी समय सुंदरी वाला स्वरूप श्री विष्णु रूप था। भगवान विष्णु जी शिव जी की दशा देखकर मुस्काए तथा कहा कि ऐसे उन राक्षसों से अमृत छीनकर लाया था। वे राक्षस ऐसे मोहित हुए थे जैसे मेरा छोटा भाई कामजीत अब काम पराजित हो गया। माना जाता है कि शंकर जी की समाधि तो अडिग (न डिगने वाली) थी जैसा पौराणिक सिद्धांत बताते हैं। वह भी मोहे गए। माया के वश हो गए। भगवान शिव की पत्नी पार्वती तीनों लोकों में सबसे सुंदर स्त्रियों में से एक है। शिव राजा ऐसी सुंदर पत्नी को छोड़ मोहिनी स्त्री के पीछे चल पड़े। पहले अठासी हजार वर्ष तप किया। फिर लाख वर्ष तप किया काम पर विजय पाने के लिए और भ्रम भी था कि मैनें काम जीत लिया। फिर हार गया।

शिव जी ने अंतिम बार हिमालय राजा की बेटी पार्वती से विवाह किया

शिव जी ने उसके पश्चात् हिमालय राजा की बेटी पार्वती से अंतिम बार विवाह किया। पार्वती वाली आत्मा वही है जो सती जी थी।

शिव जी ने पार्वती जी को दिया था अमर मंत्र

पार्वती रूप में अमरनाथ स्थान पर अमर मंत्र शिव जी से प्राप्त करके कुछ समय के लिए अमर हुई । ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों को कबीर जी ने सत्य मंत्र दिया था।

शिव लिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई और महाशिवरात्रि पर‌ शिवलिंग पूजा करना क्या सही है?

शिव महापुराण {जिसके प्रकाशक हैं ‘‘खेमराज श्री कृष्णदास प्रकाशन मुंबई (बम्बई), हिन्दी टीकाकार (अनुवादक) हैं विद्यावारिधि पंडित ज्वाला प्रसाद जी मिश्र} भाग-1 में विद्यवेश्वर संहिता अध्याय 5 पृष्ठ 11 पर नंदीकेश्वर यानि शिव के वाहन ने बताया कि शिव लिंग की पूजा कैसे प्रारम्भ हुई?

काल ब्रह्म (तीनों गुणों का पिता है) ने जान-बूझकर शास्त्र विरूद्ध साधना बताई क्योंकि यह नहीं चाहता कि कोई शास्त्रों में वर्णित साधना करके इस का भोजन बनने से बच सके।

काल ने ब्रह्मा और विष्णु का युद्ध करवाया और बीच में बिना ओर छोर का स्तंभ खड़ा कर दिया

विद्यवेश्वर संहिता अध्याय 5 श्लोक 27.30 :- पूर्व काल में जो पहला कल्प जो लोक में विख्यात है। उस समय ब्रह्मा और विष्णु का परस्पर युद्ध हुआ। उनके मान को दूर करने के लिए उनके बीच में उन निष्कल परमात्मा ने स्तम्भरूप अपना स्वरूप दिखाया। तब जगत के हित की इच्छा से निर्गुण शिव ने उस तेजोमय स्तंभ से अपने लिंग आकार का स्वरूप दिखाया। उसी दिन से लोक में वह निष्कल शिव जी का लिंग विख्यात हुआ।

काल ब्रह्म ने अपने पुत्रों को निष्कल स्तंभ की पूजा करने का आदेश दिया

विद्यवेश्वर संहिता पृष्ठ 18 अध्याय 9 श्लोक 40.43 :- इससे मैं अज्ञात स्वरूप हूँ। पीछे तुम्हें दर्शन के निमित साक्षात् ईश्वर तत्क्षणही मैं सगुण रूप हुआ हूँ। मेरे ईश्वर रूप को सकलत्व जानों और यह निष्कल स्तंभ ब्रह्म का बोधक है। लिंग लक्षण होने से यह मेरा लिंग स्वरूप निर्गुण होगा। इस कारण हे पुत्रों! तुम नित्य इसकी अर्चना करना। यह सदा मेरी आत्मा रूप है और मेरी निकटता का कारण है। लिंग और लिंगी के अभेद से यह महत्व नित्य पूजनीय है। यह विवरण श्री शिव महापुराण (खेमराज श्री कृष्ण दास प्रकाशन मुंबई द्वारा प्रकाशित) से शब्दाशब्द लिखा है।

काल ने अपने लिंग (गुप्तांग) की पूजा करने को कह दिया। पहले तो तेजोमय स्तंभ ब्रह्मा तथा विष्णु के बीच में खड़ा कर दिया। फिर शिव रूप में प्रकट होकर अपनी पत्नी दुर्गा को पार्वती रूप में प्रकट कर दिया और उस तेजोमय स्तंभ को गुप्त कर दिया और अपने लिंग (गुप्तांग) के आकार की पत्थर की मूर्ति प्रकट की तथा स्त्री के गुप्तांग (लिंगी) की पत्थर की मूर्ति प्रकट की। उस पत्थर के लिंग को लिंगी यानि स्त्री की योनि में प्रवेश करके ब्रह्मा तथा विष्णु से कहा कि यह लिंग तथा लिंगी अभेद रूप हैं यानि इन दोनों को ऐसे ही रखकर नित्य पूजा करना।

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इसके पश्चात् यह बेशर्म पूजा सब हिन्दुओं में देखा-देखी चल रही है। आप मंदिर में शिवलिंग को देखना। उसके चारों ओर स्त्री इन्द्री का आकार है जिसमें शिवलिंग प्रविष्ट दिखाई देता है। यह पूजा काल ब्रह्म ने प्रचलित करके मानव समाज को दिशाहीन कर दिया। वेदों तथा गीता के विपरीत साधना बता दी। शिव पुराण भाग-1 में विद्यवेश्वर संहिता के पृष्ठ 11 पर अध्याय 5 श्लोक 27.30 में पढ़ा कि शिव ने जो तेजोमय स्तंभ खड़ा किया था। फिर उस स्तंभ को गुप्त करके पत्थर को अपने लिंग (गुप्तांग) का आकार दे दिया और बोला कि इसकी पूजा किया करो।

शिवलिंग पूजा करने वालों की भक्ति को अंधश्रद्धा भक्ति कहा है

शिवलिंग की पूजा अंध श्रद्धावान लोग करते हैं जो शर्म की बात तो है ही, परंतु धर्म के विरूद्ध भी है क्योंकि यह गीता व वेद शास्त्रों में नहीं लिखी है। इसका खण्डन सूक्ष्मवेद में इस प्रकार किया है –

।। धरै शिव लिंगा बहु विधि रंगा, गाल बजावैं गहले। जे लिंग पूजें शिव साहिब मिले, तो पूजो क्यों ना खैले।।

परमेश्वर कबीर जी ने समझाया है कि तत्वज्ञानहीन मूर्ति पूजक अपनी साधना को श्रेष्ठ बताने के लिए गहले यानि ढ़ीठ व्यक्ति गाल बजाते हैं यानि व्यर्थ की बातें बड़बड़ करते हैं जिनका कोई शास्त्र आधार नहीं होता। वे जनता को भ्रमित करने के लिए विविध प्रकार के रंग-बिरंगे पत्थर के शिवलिंग रखकर अपनी रोजी-रोटी चलाते हैं।

कबीर जी ने कहा है कि मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि यदि शिव जी के लिंग को पूजने से शिव जी भगवान का लाभ लेना चाहते हो तो आप धोखे में हैं। यदि ऐसी बेशर्म साधना करनी है तो खागड़ के लिंग की पूजा कर लो जिससे गाय को गर्भ होता है। उससे अमृत दूध मिलता है। हल जोतने के लिए बैल व दूध पीने के लिए गाय उत्पन्न होती है जो प्रत्यक्ष लाभ दिखाई देता है। आपको पता है कि खागड़ के लिंग से कितना लाभ मिलता है। फिर भी उसकी पूजा नहीं कर सकते क्योंकि यह बेशर्मी का कार्य है।

अंध श्रद्धा भक्ति और मनमाना आचरण क्या है?

अंध श्रद्धा भक्ति के तहत अंधश्रद्धालुगण कई प्रावधान करते हैं :- श्री विष्णु जी, श्री शिव जी, श्री देवी दुर्गा माता जी, श्री गणेश जी, श्री लक्ष्मी जी, श्री पार्वती जी तथा अन्य लोक प्रसिद्ध देवी-देवताओं की मूर्तियों की पूजा यानि उनको प्रतिदिन स्नान करवाना, नए वस्त्र पहनाना, तिलक लगाना, उन पर फूल चढ़ाना, अच्छा भोजन बनाकर उनके मुख को भोजन लगाकर भोजन खाने की प्रार्थना करना। दूध पिलाना, अगरबत्ती व ज्योति जलाकर उनकी आरती उतारना। उनसे अपने परिवार में सुख-शांति, समृद्धि के लिए प्रार्थना करना।

नौकरी-रोज़गार, संतान व धन प्राप्ति के लिए अर्ज करना आदि-आदि तथा शिव जी के लिंग यानि गुप्तांग की पूजा करना। उस लिंग पर दूध डालना, उसके ऊपर ताम्बे या पीतल का स्टैंड रखकर ताम्बे या पीतल के घड़े (छोटी टोकनी) के नीचे तली में बारीक छेद करके पानी से भरकर रखना जिससे लगातार लिंग के ऊपर शीतल जल की धारा गिरती रहती है। यह मूर्ति पूजा है। साधक स्वयं महत्वपूर्ण अवसरों पर मनमाने आचरणवश व्रत करते हैं तथा कुंभ स्नान आदि करने जाते हैं।

श्रीमद्भगवत गीता के अध्याय 16 श्लोक 23.24 में स्पष्ट निर्देश है कि जो साधक शास्त्रों में वर्णित भक्ति की क्रियाओं के अतिरिक्त साधना व क्रियाऐं करते हैं, उनको न सुख की प्राप्ति होती है, न सिद्धि यानि आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है, न उनको गति यानि मोक्ष की प्राप्ति होती है अर्थात् व्यर्थ पूजा है। यह नहीं करनी चाहिए क्योंकि साधक इन तीन लाभों के लिए ही परमात्मा की भक्ति करता है। इसलिए वे धार्मिक क्रियाऐं त्याग देनी चाहिएं जो गीता तथा वेदों जैसे प्रभुदत्त शास्त्रों में वर्णित नहीं है। उपरोक्त पूजा का वेदों तथा गीता में उल्लेख न होने से शास्त्राविरूद्ध साधना है।

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